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ऋषिकेश में कैंसर का इलाज,गंगा प्रेम अस्पताल की पहल

उत्तराखंड में प्रति वर्ष करीब 10,000 कैंसर रोग के नए मामले सामने आते हैं, इनमें से 80% मरीजों में तो रोग का पता तभी चल पाता है जब यह रोग तीसरी या चौथी अवस्था में पहुँच कर असाध्य हो चुका  होता है। केवल उत्तराखंड में ही नहीं, संपूर्ण भारत में 70% मामलों में कैंसर रोग की जानकारी तभी हो पाती है जब यह रोग ऐसी असाध्य अवस्था में पहुँच चुका होता है, इसका इलाज संभव नहीं हो पाता तथा मरीज़ धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ता जाता है।

जीवनशैली में बदलावों के कारण, अब मृत्यु व रोग का कारण केवल कुपोषण, संक्रामक बीमारियाँ, व जच्चा-बच्चा की खराब देख-भाल ही नहीं, कैंसर भी है। पर्यावरण में विषैले पदार्थ, मद्य पदार्थों का सेवन, व्यायाम न करना, व तम्बाकू का सेवन, ये कैंसर होने के कुछ कारण हैं। उत्तराखंड में तम्बाकू का सेवन गले, जिव्हा, मुख, व खाने की पाइप जैसे कैंसरों का मुख्या कारण है। उत्तराखंड में पुरुषों में तम्बाकू संबंधित कैंसर सबसे अधिक पाए जाते हैं। राज्य की महिलाओं में सर्विक्स का कैंसर सबसे अधिक पाया जाता है। सर्विक्स कैंसर का पता एक सामान्य 'पेप स्मीअर' टेस्ट से हो सकता है। आवश्यकता केवल इस बात की है की महिलाओं में यह जागरूकता हो की उन्हें समय-समय पर स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर के पास जान चाहिए।
जब कैंसर असाध्य हो जाता है तो मरीज़ को हॉस्पिटल इलाज की  नहीं, बल्कि 'टर्मिनल कैंसर केयर' की आवश्यकता होती है, इसका अर्थ है की मरीज़ को ऐसे इलाज दिया जाए, जिससे उसके आखिरी दिन व माह, दर्द-रहित हो पाएं। ऐसे मैं एलॉपथी के साथ-साथ ध्यान, योग,आयुर्वेद, होमेओपैथी, सुगंध-चिकित्सा, आदि प्रानालियों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। मरीज़ के साथ-साथ उसके परिवार को भी सबल बनाने की आवश्यकता होती है ताकि वे आने वाली मृत्यु का दुःख झेलने में सक्षम हो पाएं।

ऋषिकेश में कैंसर की रोकथाम तथा मरणासन्न मरीजों की देख-भाल के लिए गंगा प्रेम अस्पताल के कैंसर विशेषज्ञ हर माह के आखिरी रविवार को पंजाब सिंध क्षेत्र की सरदारनी नानकी देवी डिस्पेंसरी में मुफ्त कैंसर शिविर का आयोजन करते हैं। दिल्ली के राजीव गाँधी कैंसर अस्पताल के वरिष्ठ सर्जन, डॉ अजय दीवान, हर माह ऋषिकेश में कैंसर रोगियों को परामर्श देते हैं। कई मरणासन्न कैंसर मरीजों को घर पर भी सेवा प्रदान की जाती है। डॉ दीवान का कहना है, "कैंसर का यदि पहली अवस्था में पता चल पाए तो यह रोग साध्य है। यदि लम्बे समय तक बुखार रहे, तिल या मस्सों में बदलाव आये, अकारण गला ख़राब रहे, वज़न घटता जाए, या स्त्रियों को योनी से स्राव हो; तो तुंरत कैंसर के डॉक्टर से जांच करवाएं. यह कैंसर के शुरूआती लक्षण हो सकते हैं".
गंगा प्रेम होस्पिस के यह कैंसर शिविर सितम्बर 2007 में आरम्भ हुए तथा अब तक 600 से अधिक मरीजों को मुफ्त परामर्श दिया जा चुका है। कई मरणासन्न मरीजों को घर पर देख-भाल, मुफ्त दवाएं, व अन्य सुविधाएं भी दी जा चुकी हैं।

ऋषिकेश में 11 अक्टूबर को गंगा प्रेम अस्पताल का शिलान्यास उत्तराखंड के मुख्या मंत्री, डॉ निशंक द्वारा, रायवाला, ऋषिकेश में किया गया। उत्तराखंड में कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए, अब देहरादून के हिमालयन इंस्टिट्यूट के अस्पताल, व हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में रेडियोथिरेपी की व अन्य सुविधायें हैं, परन्तु आवश्यकता है कैंसर के प्रति अधिक जागरूकता की। कैंसर का इलाज बहुत मंहगा होता है। सामान्य जन-मानस इस इलाज का व्यय नहीं उठा सकता। इलाज के बाद भी मरीज़ पूर्णत: ठीक हो पायेगा, ऐसा नहीं है। गंगा प्रेम अस्पताल की पूजा डोगरा ने बताया कि अधिक जानकारी के लिए हमारे स्वयंसेवी हमेशा तैयार हैं।

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