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समस्याओं के बीच कांग्रेस का बने रहना

महाराष्ट्र में कांग्रेस बहुमत के आंकड़े के एकदम पास पहुंच कर ठिठक गई और हरियाणा में भी थोड़ी से कसर रह गई, लेकिन दोनों ही जगह सरकार बनाना उसके लिए मुश्किल नहीं होगा। इस छोटी सी गुंजाइश को नजरंदाज कर दिया जाए तो एक तरह से महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों ही जगह जनता ने स्थाई सरकार के लिए ही वोट दिया है। पहले बात करते हैं महाराष्ट्र की, जहां कांग्रेस पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा मजबूत होकर उभरी है। बहुत साल बाद वह समय आया है, जब कांग्रेस महाराष्ट्र विधानसभा में 80 सीटों का आंकड़ा पार कर रही है। और इससे भी बड़ी बात यह है कि कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी का अंतर इस बार काफी बढ़ गया है।

इसके पहले तक दोनों पार्टियों की ताकत में 19-20 का फर्क होता था, यह फर्क अब ज्यादा बड़ा हो गया है। आने वाले दिनों में यह और भी बढ़ सकता है, क्योंकि दोनों ही दलों से काफी संख्या में बागी उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था, सरकार बनेगी तो जीतने वालों की वापसी का दौर शुरू होगा। सरकार की बागडोर कांग्रेस के हाथ में है  इसलिए उम्मीद यही है कि ज्यादातर बागी कांग्रेस में ही शामिल होंगे। दरअसल ये नतीजे कांग्रेस और एनसीपी दोनों के वर्तमान और भविष्य के बारे में काफी कुछ कहते हैं।

इन नतीजों से दो बातें साफ हैं, एक तो एनसीपी कमजोर हो रही है और दूसरे राज्य की जनता का ज्यादा बड़ा हिस्सा एनसीपी के मुकाबले कांग्रेस के साथ आ चुका है। काफी समय से यह कहा जा रहा है कि शरद पवार अपनी राजनीति को किधर ले जाना चाहते हैं, यह स्पष्ट नहीं है। लगता है, इसका असर अब जमीन पर दिखाई देने लगा है। यह भी मुमकिन है कि आने वाले दिनों में पवार की अपनी पार्टी पर से पकड़ और भी कमजोर हो जाए।

कांग्रेस के प्रदर्शन के भूगोल को देखें तो लगता है कि कांग्रेस ने अपने वोटों को फिर से एकजुट कर लिया है। दलितों और आदिवासियों को बिना साथ लिए ऐसे नतीजों की उम्मीद नहीं की जा सकती। इन नतीजों में कांग्रेस की वापसी का एक स्पष्ट संकेत तो है ही। गठजोड़ के शक्ति समीकरणों का यह बदलाव कांग्रेस की बात का वजन बढ़ाएगा। कम से कम मंत्रिमंडल के  निर्माण में उसकी पंसद-नापसंद अब पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण तो होगी ही।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ये नतीजे उस वक्त आए हैं, जब महाराष्ट्र में सब कुछ अच्छा नहीं है। प्रदेश के विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे इलाके अभी भी सूखे से ग्रस्त हैं। इन इलाकों से किसानों की आत्महत्याओं की खबरें अभी तक आ रही हैं। कपास का उत्पादन काफी कम हुआ है और सूखे के कारण अगली बुवाई भी ठीक से नहीं हो सकी है। इन सबके बावजूद अगर जनता कांग्रेस को वोट दे रही है तो इसका अर्थ यही है कि उसके पास कोई और विकल्प नहीं है। विपक्षी दल जनता को एक अच्छा विकल्प होने का आश्वासन नहीं दे सके।

नतीजों से एक बात और स्पष्ट है कि शिवसेना इस समय संकट में है। अपना पहला चुनाव लड़ रही राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने उसकी तकरीबन 30 सीटों पर सेंध मारी है। भाजपा शिवसेना गठजोड़ में भाजपा उतनी कमजोर नहीं हुई जितनी शिव सेना हुई है। राज ठाकरे खुद जितना हासिल कर रहे हैं, उससे ज्यादा वे शिवसेना को नुकसान पहुंचा रहे हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में कुलजमा जो बदलाव हो रहा है, वह शिव सेना के खिलाफ और कांग्रेस के पक्ष में जा रहा है।

महाराष्ट्र के विपरीत हरियाणा में नि:संदेह कांग्रेस कमजोर हुई है। इसे चाहे हम पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले देखें, या पिछले आम चुनाव के मुकाबले। सूखे और अन्य वजहों से कृषि में जो संकट है, उसका असर कांग्रेस पर पड़ा है। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि काफी समय बाद भूपेंद्र सिंह हुड्डा कांग्रेस के ऐसे मुख्यमंत्री बन गए हैं, पार्टी को वापस सत्ता में लेकर आए हैं। इसके पहले यह कारनाम सत्तर के दशक में बंसीलाल ने किया था। इस लिहाज से कांग्रेस के लिए यह उपलब्धि भी है।

महाराष्ट्र में आमतौर पर मतदाताओं को कांग्रेस का कोई पुख्ता विकल्प नहीं दिखाई दिया, लेकिन हरियाणा में ऐसा नहीं है। वहां चौटाला में बहुत से मतदाताओं को विकल्प दिखाई दिया इसलिए उन्हें वोट भी मिले। चौटाला मजबूत होकर जरूर उभरे, लेकिन इतने नहीं कि सरकार बना सकने की स्थिति में आ सकें। हरियाणा में कांग्रेस की जीत की एक वजह विपक्ष में बिखराव भी है। मसलन भाजपा और चौटाला अगर एक साथ होते तो तस्वीर बदल भी सकती थी। इन दोनों के अलावा भजन लाल की पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी वहां किसी समीकरण में नहीं थे इसलिए भी कांग्रेस की राह आसान हो गई।

हरियाणा में चौटाला की ताकत बढ़ी जरूर है, लेकिन आगे चलकर वे कांग्रेस के लिए कोई चुनौती खड़ी कर पाएंगे या नहीं, यह अभी नहीं कहा जा सकता। इसकी कई वजहें हैं। एक तो चौटाला की राजनीति काफी पुराने ढंग की है। वे एक कृषि प्रधान प्रदेश के किसान नेता की राजनीति ही कर रहे हैं। जबकि हरियाणा देश के उन प्रदेशों में है जहां सबसे तेजी से शहरीकरण हो रहा है। यह बदलाव जो समीकरण बना रहा है, चौटाला उनका प्रतिनिधित्व नहीं करते। हरियाणा काफी तेजी से बदल रहा है और उस बदलाव का सबसे ज्यादा फायदा उठाने की स्थिति में कांग्रेस ही है, ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी नहीं है।

पांच साल का समय काफी लंबा होता है और इस पूरे समय में उन्हें विपक्ष में बैठना होगा। हरियाणा की पिछले पांच साल की राजनीति से एक बाद स्पष्ट है कि वहां का विपक्षी दल किसी ऐसे बड़े राजनैतिक आंदोलन खड़ा करने और उसे लंबे समय तक चलाने की कोशिश नहीं करता, जो सरकार को परेशान कर सके। यही अगर आगे भी चला तो प्रदेश सरकार का रास्ता और आसान हो जाएगा। केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार के लिए तो खैर यह राहत की बात होगी ही।

लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रवक्ता हैं

rangarajan.mahesh@gmail.com

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