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तमिलनाडु : श्रीलंका पर जारी है राजनीति

भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में गठबंधन की राजनीति का उदय हुए दो दशक से ज्यादा बीत चुके हैं। अब गठबंधन में शामिल दलों के आपसी रिश्तों ने एक शक्ल लेना शुरू कर दिया है। पहले गठबंधन के सबसे बड़े दल को सभी छोटी पार्टियों की जायज और नाजायज मांग माननी पड़ती थी, जबकि अब सभी दल राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की मजबूरी और सीमाओं का सम्मान करना भी सीख गए हैं। श्रीलंका की तमिल समस्या के बारे में तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके का नजरिया इस बात का प्रमाण है।

श्रीलंका की तमिल समस्या को लेकर तमिलनाडु के सभी राजनीतिक दलों में होड़ लगी रहती है। लोकसभा चुनाव के दौरान यह एक बड़ा मुद्दा था। तब श्रीलंका की सेना तमिल टाइगर्स के खिलाफ जारी संघर्ष के अंतिम मुकाम पर थी। इस कारण यह मुद्दा चुनाव में ज्वलंत विषय बन गया था। वैसे तो डीएमके ने श्रीलंका की तमिल आबादी को अपना समर्थन दिया, किन्तु संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) का घटक होने के कारण उसे एक संतुलित नीति ही अपनानी पड़ी।

अब जबकि चुनाव हो चुके हैं तथा केंद्र में संप्रग की सरकार है, चुनावों में शिकस्त पाने वाले एआईएडीएमके ने राज्य में सत्तारूढ़ डीएमके के खिलाफ आक्रामक रवैया अपना लिया है। अन्य विपक्षी दलों का भी आरोप है कि केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन का घटक होने के बावजूद श्रीलंका के तमिलवंशियों को कुचलने के अभियान पर अंकुश लगाने तथा वहां के शरणार्थियों की कठिनाइयों को दूर करने में डीएमके विफल रही है। डीएमके ने इसका जोरदार खंडन किया है, किन्तु केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा होने के कारण वह कोई कड़ा रवैया अपनाने में विफल रही है।

विपक्षी दलों के इस हमले की हवा निकालने के लिए मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने कांग्रेस और अपने दल के सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री के पास भेजा। प्रतिनिधिमंडल ने श्रीलंका के शिविरों में रह रहे तमिल शरणार्थियों की हालत का जायजा लेने के लिए सांसदों का एक दल वहां भेजने की मांग की। श्रीलंका में हुए गृह युद्ध के कारण इस वर्ष मई से वहां लगभग तीन लाख तमिलभाषी शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। प्रधानमंत्री से भेंट का नतीजा यह हुआ कि सांसदों के एक दस सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को श्रीलंका के पांच दिवसीय दौरे की मंजूरी मिल गई। 14 अक्तूबर को  श्रीलंका गए  इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस, डीएमके तथा दलित पैंथर पार्टी के सांसद शामिल थे। विपक्षी दलों को शामिल न करने के कारण यह प्रतिनिधिमंडल विवादास्पद बन गया।

उनके अनुसार इसे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल कतई नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें न तो विपक्ष का कोई सदस्य है, न ही कोई पत्रकार, न कोई मानवाधिकार संगठन का व्यक्ति और न ही कोई निष्पक्ष पर्यवेक्षक। जवाब में करुणानिधि ने कहा कि यह सरकार द्वारा भेजा गया प्रतिनिधिमंडल नहीं था। दोनों देशों की सरकारों ने इस दौरे की मंजूरी भले ही दी हो, सफर का खर्चा संबंधित दलों ने उठाया है। लेकिन उनका यह तर्क अन्य विपक्षी दलों के गले भी नहीं उतरा।

केंद्रीय मंत्री टी.आर.बालू के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने फुर्ती दिखाते हुए स्वदेश लौटते ही अपनी रिपोर्ट करुणानिधि को सौंप दी। प्रतिनिधिमंडल की स्वदेश वापसी पर अगवानी करने मुख्यमंत्री करुणानिधि खुद चेन्नई हवाई अड्डे पर उपस्थित थे। रिपोर्ट के अनुसार श्रीलंका के शरणार्थी शिविरों की स्थिति अच्छी है। उन्हें पुन: बसाने का काम भी एक पखवाड़े में शुरू हो जाएगा। यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री को भी भेज दी गई। गठबंधन का धर्म निभाते हुए करुणानिधि ने श्रीलंका के संवेदनशील मुद्दे को संप्रग सरकार के आड़े नहीं आने दिया। भारत-श्रीलंका रिश्तों के बारे में सकारात्मक रुख अपनाने के कारण करुणानिधि पर विपक्षी दलों ने हमला किया और तमिलनाडु की जनता के बीच उनकी लोकप्रियता पर भी इसका कोई अच्छा असर नहीं पड़ा।

पिछले महीने पूर्व मुख्यमंत्री सी.एन.अन्नादुरई के शताब्दी समारोह में डीएमके ने एक प्रस्ताव पारित कर करुणानिधि को इस बात के लिए अधिकृत किया कि वे राज्य में रह रहे एक लाख श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों को भारत की नागरिकता व यहीं बसाने के लिए केंद्र से बातचीत करें। एआईएडीएमके का कहना है कि शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोग सदैव अपने देश लौटना चाहते हैं। यदि आज तमिल लोगों को भारत की नागरिकता दे दी गई तो कल बांग्लादेश, म्यांमार और तिब्बत के शरणार्थी भी ऐसी ही मांग करेंगे। 

radhaviswanath73@yahoo.com

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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