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सूर्य का मानवीकरण

रावण को मारने के पूर्व रणभूमि में चिंतित राम को अगस्त मुनि ने आदित्य हृदय स्त्रोत दिया। युधिष्ठिर ने द्रौपदी को सूर्य से प्राप्त अक्षय पात्र दिया। पुराणों में अनेक प्रसंग सूर्य की महिमा बताते हैं। वैसे भी प्रतिदिन सूर्य को जल देने की परंपरा रही है।

छठ पर्व (कार्तिक शुक्ल षष्ठी) पर सांयकाल डूबते सूर्य और सप्तमी के प्रात:काल उगते सूर्य की लालिमा करोड़ों व्रती महिला-पुरुष के लिए अलग रंग लाती है। विशेष होता है सूर्य। जलाशयों में हाथों में अर्घ लेकर खड़े व्रती और घाट पर दर्शक के रूप में खड़े हजारों-लाखों लोग उस लालिमा को देखकर सूर्य का जय-जयकार कर उठते हैं। इस व्रत में महिलाएं सूर्य से वार्तालाप करती हैं -
‘अन्न, धन लक्ष्मी हे दीनानाथ, अहई के देल,
एक पुत्र हे दीनानाथ सगर अंधार।’

अन्न, धन, लक्ष्मी सब आपका ही दिया हुआ है। कमी है तो एक संतान की। इस व्रत में सूर्य से बेटी भी मांगी जाती है। छठ व्रत पर गाए जाने वाले गीतों में तो सूर्य भी किसी माता का पुत्र है। चंद्रमा उसकी बहन है। सूर्य की माता और चंद्रमा बहन उन्हें जगाती है ‘उठो बबुआ भेल भिंसार,
अर्घ केरा बेर भेल।’
सूर्य भी कम नहीं हैं, अवसर पाकर वे भी स्त्री को सीख देते हैं -
‘देवे के देलिअऊगे अबला, गर्व जनि बोल,
गर्व से बोलवे के अबला, उहो लेबऊ छीन।’

इन लोकगीतों का गहरा अर्थ है। सूक्ष्म ढंग से लोगों को जीवन और जगत के बारे में समझाया जाता रहा है। सूर्य से ही सबकुछ है। जीवन देने और छीनने वाला भी वही है। सूर्य को अर्घ के रूप में चढ़ने वाली सारी वस्तुएं -फल-फूल, अक्षत उन्हीं का दिया हुआ है। उन्हीं को अर्पित किया जाता है। सर्व शक्तिमान सूर्य की अराधना करता लोकमन, उसके अंदर भी दया, सहानुभूति और ममता ढूंढ लेता है। सूर्य को अपना हमसफर बना लेता है लोकमन। वह किसी का पुत्र, किसी का भाई तो है ही।

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