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कश्मीर में संवाद

जम्मू कश्मीर पिछले कई दिनों से विशेष रूप से खबरों में नहीं है और यह काफी राहत की बात है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कश्मीर मामले में कुछ नहीं हो रहा है। गृहमंत्री चिदंबरम का यह बयान काफी अर्थवान है कि कश्मीर में बिना शोर-शराबे के बातचीत होनी चाहिए और सरकार किसी भी समूह से बातचीत के लिए तैयार है। कश्मीर के पुराने विश्वसनीय विशेषज्ञ वजाहत हबीबुल्ला को कश्मीर भेजा गया है और वे निश्चय ही खामोशी से संवाद के तार जोड़ रहे होंगे।

कश्मीर में माहौल इसलिए भी ठीक है, क्योंकि पाकिस्तान अपने आप में ही उलझा हुआ है और पाकिस्तान की कुछ स्वायत्त संस्थाएं कश्मीर में घुसपैठ के काम में लगी हैं लेकिन अस्थिरता फैलाने की कोई बड़ी योजना बनाने की स्थिति में पाकिस्तान नहीं है। अगर गृहमंत्री चिदंबरम चुपचाप बातचीत के रास्ते खोलने की बात कर रहे हैं तो हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि उनके पास कोई दूरगामी  योजना है और उस पर अमल की तैयारी भी है। कश्मीर में एक बड़ी समस्या यह रही है कि कोई भी योजना लंबे वक्त नहीं चली।

अक्सर बीच में योजनाकार बदल जाते हैं और आधे में ही उसे छोड़ दिया जाता है। बातचीत की कई बार पहल हुई और हर बार उसे जुट कर अपनी परिणति पर पहुंचाने की बजाए अचानक छोड़ दिया गया। अगर हम मानते हैं कि बातचीत से ही कश्मीर समस्या का हल हो सकता है तो फिर लगातार इसके लिए कोशिशें जारी रहनी चाहिए। सैयद शाह गिलानी जैसे लोग दिक्कतें पैदा करेंगे, लेकिन कश्मीर से आते हुए संकेत यह भी साफ कर देते हैं कि अलगाववादी यह जान चुके हैं कि नई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में अलगाववाद बहुत दूर तक नहीं चलेगा।
इसलिए प्रधानमंत्री की जम्मू-कश्मीर यात्रा का महत्व तो है ही लेकिन उसके पहले और उसके बाद अनेक स्तरों पर बातचीत की प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। कश्मीर में कोई भी विवाद अक्सर उग्र रूप पकड़ लेता है और यह आगे भी होते रहेगा, लेकिन यह जान लेना चाहिए कि इनका सिर्फ फौरी असर है, दूरगामी उद्देश्य संवाद के रास्ते खुले रखकर सौहार्द और समझौते का माहौल बनाया जाए। अब अगर कश्मीर फिर से चर्चा में जोरों से आए तो वह अच्छी वजहों से आए।

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