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राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों से खेल

राष्ट्रमंडल खेलों का वर्ष 2010 में आयोजन होना है। विगत माह इसकी तैयारियों की समीक्षा को आई राष्ट्रमंडल खेल महासंघ सीजीएफ की टीम तैयारियों से नाखुश होकर वापस गई। राष्ट्रमंडल खेलों के लिए भारतीय आयोजन समीति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी और सीजीएफ के सदस्यों के बीच सुस्त तैयारी को लेकर विवाद भी हुआ। सीजीएफ के अध्यक्ष माइक फेनेल भी भारत में होने वाले इन खेलों की तैयारियों से चिंतित हैं। समय पर खेलों के लिए स्टेडियम और उनसे जुड़े निर्माण कार्यो को पूरा न कर पाना हमारे देश की कार्यप्रणाली को दर्शाता है। हमारे प्रधानमंत्री ने समय पर कार्य पूर्ण करने का आश्वासन सीजीएफ को दिया है। इसके बावजूद आयोजन समिति के सदस्य और राजनेता राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों से खेल खेले जा रहे हैं। यह खिलवाड़ भविष्य में इस प्रकार के आयोजनों की मेजबानी भारत को दिए जाने के संबंध में प्रश्न चिह्न् खड़ा करती है।
पंकज भार्गव, कंडोली, देहरादून

शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान दें
बाबा रामदेव की भारत की व्यवस्था सुधारने संबंधी प्रभाव वाले सुझाव आश्चर्य में डाल  देने वाले और ठोस हैं। उनके सुझाव अनपढ़ और बुद्धिजीवी को भी आसानी से समझ में आ जाएंगे। ब्रिटेन, कनाडा आदि विश्व के अधिकांश सभ्य देशों में वहां के जनप्रतिनिधि सरकारी स्कूलों में ही अपने बच्चों को पढ़ाते हैं और सरकारी अस्पतालों में ही इलाज करवाते हैं। इसी कारण वहां की शिक्षा व स्वास्थ्य की व्यवस्था बहुत उन्नत स्तर की हो गई है तो फिर हमारे यहां क्यों नहीं हो सकती? जब नेता व उच्च अधिकारी इन सरकारी संस्थानों से जुड़ जाएंगे तो सरकारी स्कूल और अस्पताल एक ही दिन में ठीक हो जाएंगे और देश के आम आदमी को शिक्षा व स्वास्थ्य की श्रेष्ठ व्यवस्था उपलब्ध हो जाएगी। एम्स जैसे सरकारी अस्पताल और दिल्ली विश्वविद्यालय आदि में अच्छी स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएं इसलिए हैं, क्योंकि वहां बड़े-बड़े नेता व अधिकारियों का सीधा संबंध है। ऐसे अनेक विचार है जिन्हें सुनकर लगता है कि अगर बाबा रामदेव वर्तमान सरकार के गुरु वसिष्ठ बन जाएं तो राम राज्य आ जाएगा। वर्तमान में सरकारी अस्पताल पोस्टमार्टम सेंटर बनकर रह गए हैं।  जिस कारण केन्द्रीय कर्मचारी सीजीएचएस की सुविधा लेते हैं। इस पर अरबों रुपये अतिरिक्त खर्च होता है। गरीब भी वहां जाना पसंद नहीं करते और अरबों-खरबों रुपये व्यर्थ जा रहे हैं। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
रमेश चन्द्र आनन्द, देहरादून

चैनलों पर लगाम लगाए सरकार
दिन-प्रतिदिन खुलते नए न्यूज चैनलों को देखकर लगता है कि शायद खबरों की दुनिया में प्रदूषण फैलता जा रहा है। देश में फिलहाल 197 न्यूज चैनल हैं। कुछ चैनलों की न तो खबरें स्पष्ट हैं, न ही प्रस्तुति। कुछ न्यूज चैनल तो ऐसे लोगों के हैं, जिनको मीडिया क्षेत्र का जरा सा भी अनुभव नहीं है। इनमें काम करने वाले लोगों का भविष्य भी सुरक्षित नहीं है। वजह ये चैनल कब बंद हो जाएं, पता नहीं। जिस तरह से ये चैनल छोटी-मोटी खबरों को ब्रेकिंग न्यूज बनाकर पेश करते हैं, वे कभी-कभी हास्यास्पद लगती हैं। सरकार को चाहिए कि वह ऐसे लोगों व चैनलों पर लगाम लगाए, जो अपने हित के लिए पत्रकारिता जैसे सभ्य पेशे को बदनाम कर रहे हैं।
इंतिखाब आलम, बड़कोट

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