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कौन पढ़ेगा आईआईटी में

आईआईटी संस्थानों की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठने लगे हैं। एक दशक पहले तक इन संस्थानों की गिनती दुनिया के टॉप 100 संस्थानों में होती थी पर ताजे सर्वेक्षणों में ये अपना मुकाम पूरी तरह खो चुके हैं। इनमें प्रवेश की परीक्षा को अंकों के आधार पर स्पर्धात्मक बनाने मात्र से ही इस समस्या का समाधान संभव नहीं, यह बात तो देश के मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को भी जल्दी ही समझ में आ गई लगती है, लेकिन यह सवाल आज भी प्रासंगिक है कि इनकी गुणवत्ता सुधारने के फौरी उपायों की वाकई जरूरत है। बता रहे हैं मदन जैड़ा

इन दिनों मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के बयान पर भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थानों (आईआईटी) में प्रवेश परीक्षा की अर्हता को लेकर एक राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ी है। राजनीतिक रुख अख्तियार कर चुकी इस बहस से हालांकि सिब्बल ने सफाई देकर खुद को अलग कर लिया है कि सरकार की तरफ से आईआईटी एंट्रेंस के लिए अंक सीमा बढ़ाकर 80 फीसदी करने का प्रस्ताव नहीं है। बल्कि यह आईआईटी काउंसिल को ही तय करना है कि एंट्रेंस एग्जाम के लिए कट ऑफ क्या हो? किन्तु सिब्बल की सफाई के बावजूद यह बहस जारी है कि आईआईटी एंट्रेंस के लिए क्या मानक हों? कैसे बेहतरीन आला दिमाग नौजवानों को आईआईटी में प्रवेश मिले?

इसमें कोई दो राय नहीं कि आईआईटी संस्थानों की गिनती विश्व स्तर के संस्थानों में होती है, लेकिन इधर कुछ वर्षो से आईआईटी संस्थानों की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं। कारण यह है कि एक दशक पहले तक इन संस्थानों की गिनती दुनिया के टॉप 100 संस्थानों में होती थी, वहीं ताजे सर्वेक्षणों में ये अपना मुकाम खो चुके हैं। इस गणना का आधार संस्थानों द्वारा किए गए रिसर्च पेपर और उस रिसर्च की उपयोगिता होती है। आईआईटी इसमें पिछड़ रहे हैं। इधर हाल की रिपोर्ट और भी चौंकाने वाली है। इसके अनुसार देश के टॉप 25 रिसर्च संस्थानों में भी आईआईटी स्थान नहीं पा सके। जबकि बनारस और दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसे सीमित संसाधनों वाले संस्थान इनमें आगे रहे हैं, जबकि स्वायत्तता संसाधनों के मामले में आईआईटी इनसे कहीं बेहतर स्थिति में हैं।

पहले जैसे नहीं मौके
कुछ ताजे सर्वेक्षण बताते हैं कि जो अवसर मिल रहे हैं, वे पहले जैसे बेहतरीन नहीं हैं। ऐसा क्यों है ? शोध क्यों नहीं हो रहा है ? या हो रहे हैं तो वे विश्व स्तर के क्यों नहीं हैं ? आईआईटी निदेशकों की एक कमेटी ने इसका अध्ययन किया। 2005 में बनी चांडी कमेटी ने तथ्यों की पड़ताल की। प्रमुख वजह यही निकली कि कोचिंग पढ़कर स्टुडेंट आईआईटी एंट्रेंस परीक्षा में बाजी मार रहे हैं। इस सधी-सधाई कोचिंग के सामने बुद्धिमान और ग्रामीण पृष्ठभूमि के योग्य छात्र पिछड़ रहे हैं। नतीजा यह है कि कोचिंग पढ़ कर आईआईटी में प्रवेश पाने वाले छात्र जब आईआईटी की डिग्री लेकर निकलता है तो वह एक औसत दर्जे का इंजीनियर भर होता है। उसके अंदर वैज्ञानिक शोध करने की सोच और उत्सुकता खत्म हो चुकी होती है। शिक्षाविद् प्रोफेसर यशपाल के शब्दों में कहें तो अब आईआईटी से ‘प्रोडक्ट’ निकल रहे हैं, वैज्ञानिक नहीं। इसलिए यह चुनौती इस समय आईआईटी काउंसिल के समक्ष मुंह बाए खड़ी है कि कैसे इन संस्थानों की उत्कृष्टता बरकरार रखी जाए और कैसे ‘बेस्ट ब्रेन’ वहां पहुंचे। वर्ना आईआईटी और दूसरे इंजीनियरिंग कालेजों में ज्यादा फर्क नहीं रह जाएगा।

कोचिंग की भूमिका
चांडी कमेटी की सिफारिशों पर तीन साल पहले तय किया गया था कि 12वीं बोर्ड में 60 फीसदी अंक पाने वाले ही एंट्रेंस परीक्षा में बैठ सकते हैं। मकसद यही था कि कोचिंग पढ़ने वाले छात्रों से छुटकारा मिले। लेकिन इस फैसले से कोचिंग वालों की और चांदी हो गई। अब नौवीं कक्षा से ही स्टुडेंट आईआईटी की कोचिंग लेने लगे हैं। स्कूल पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। कई विद्यार्थियों के साथ तो ऐसा भी हो चुका है कि वे कोचिंग लेकर आईआईटी में निकल गए, लेकिन 12वीं की परीक्षा में फेल हो गए। वजह है कि हर राज्य में परीक्षा बोर्ड हैं, उनकी पढ़ाई, परीक्षा के अलग-अलग नियम हैं इसलिए कोचिंग के बगैर उनका गुजारा नहीं। फिर आईआईटी की सीटें सीमित हैं, इसलिए जगह पाने के लिए ज्यादा नंबर चाहिए। यानी कोचिंग के बगैर गुजारा नहीं।

दो तरह के सवाल
सिब्बल के प्रस्ताव पर दो तरह के सवाल पैदा होते हैं। यदि आईआईटी एंट्रेंस के लिए 80 फीसदी अंक की अनिवार्यता कर दी जाए तो क्या कोचिंग वाले उम्मीदवारों से छुटकारा मिल जाएगा। इससे तो फिर कोचिंग का कारोबार और बढ़ जाएगा। आगे 12वीं में 80 फीसदी अंक लाने के लिए कोचिंग भी होगी। लेकिन इसका लाभ उन्हीं छात्रों को मिलेगा जो प्रतिवर्ष लाख-दो लाख रुपये कोचिंग पर खर्च करने का माद्दा रखते हों। उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड समेत कई राज्यों के बोर्डो की पढ़ाई केंद्र के सीबीएसई की तुलना में बेहद कठिन है। एक से दो फीसदी छात्र इतने नंबर जुटा पाने का हौसला दिखा पाते हैं। इसलिए 12वीं बोर्ड के अंकों को आधार बनाने की पहल तभी हो सकती है जब सभी शिक्षा बोर्डो के पाठ्यक्रम तथा परीक्षा प्रणाली में एकरूपता लाई जाए और आईआईटी एंट्रेंस परीक्षा के प्रश्न इन्हीं बोर्डो के सिलेबस से ही तैयार किया जाए। इधर नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ टैक्नोलॉजी (एनआईटी) एवं अन्य इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए होनी वाली प्रवेश परीक्षा एआईईईई में बदलाव के लिए भी एनआईटी काउंसिल ने एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई है।

वैसे, यह समस्या सिर्फ आईआईटी की नहीं बल्कि अन्य तकनीकी कोसरे में भी पैदा हो रही है। प्री मेडिकल टेस्ट में भी कोचिंग वाले स्टुडेंट ही निकल पा रहे हैं। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के चैयरमैन केतन देसाई के अनुसार मेडिकल परीक्षा में गांव के स्टुडेंट कोचिंग के अभाव में निकल ही नहीं पाते जबकि शहरों के छात्र कोचिंग लेकर सीट कब्जा लेते हैं। दूसरी तरफ आईआईएम, अन्य इंजीनियरिंग परीक्षाओं तथा यहां तक की अब सिविल सेवा के लिए भी कोचिंग बढ़ रही है। ऐसे में आईआईटी यदि ऐसी कोई पहल करती है तो भविष्य में उपरोक्त क्षेत्र भी ऐसे प्रावधानों से अछूते नहीं रह सकते।

प्रतिभाएं खोजनी होंगी
आईआईटी की उत्कृष्टता बहाल करने और शोध की खातिर सरकार को निश्चित रूप से ‘टेलेंट हंट’ करना चाहिए और  इसके लिए कोई वाजिब तरीका तलाशना चाहिए। तीन वैज्ञानिकों की कमेटी निश्चित रूप से कोई बीच का रास्ता निकालेगी, लेकिन सरकार को कुछ और मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा। उद्योग जगत लंबे समय से उच्च शिक्षा की सरकार के नियंत्रण से मुक्ति की मांग करता आ रहा है ताकि मुक्त व्यवस्था की प्रतिस्पर्धा में गुणवत्ता भी बहाल हो। चेम्बर ऑफ कामर्स एंड इडस्ट्री (एसोचेम) के अनुसार देश के टॉप टेन इंजीनियरिंग कोचिंग इंस्टीट्यूट सालाना 10 हजार करोड़ रुपये कमा रहे हैं। जिन छह लाख नौजवानों को वे कोचिंग देते हैं, उनमें से करीब तीन लाख आईआईटी एंट्रेस में बैठते हैं। इस राशि से देश में हर साल 40 नए आईआईटी स्थापित किए जा सकते हैं। इसी प्रकार अच्छे संस्थानों के अभाव में करीब 5 लाख छात्र विदेश चले जाते हैं जिससे भारत को प्रतिवर्ष 500 अरब रुपये की क्षति होती है। यहां बता दें कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा इंजीनियर तैयार करने वाला राष्ट्र है। यहां से नौ लाख इंजीनियर प्रतिवर्ष तैयार होते हैं, लेकिन देश में 7 आईआईटी में सिर्फ 5 हजार सीटें हैं। जो छह नए आईआईटी चालू पंचवर्षीय योजना में खुलने हैं, उन्हें मिलाकर भी यह संख्या 9 हजार से ऊपर नहीं पहुंच पाएगी। यह संख्या बेहद कम है, इसलिए इन्हें बढ़ाने के भी उपाय करने चाहिए।

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