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शिक्षा पद्धति में सुधार है असली जरूरत

अभी तीन साल पहले की ही तो बात है जब मानव संसाधन मंत्रलय ने आईआईटी के प्रवेश परीक्षा में कई फेरबदल यह कहकर किए थे कि इससे विद्यार्थियों को कोचिंग के मकड़जाल से छुटकारा मिलेगा। साथ ही गरीब तथा ग्रामीण परिवेश के बच्चों की भागीदारी आईआईटी में बढ़ेगी, लेकिन हुआ क्या? 12वीं में 60 प्रतिशत अंकों की बाध्यता और मात्र दो प्रयास जैसी शर्तो के कारण इधर गरीब तथा ग्रामीण बच्चों और आईआईटी के बीच बड़ी दीवार खड़ी हो ही गई और कोचिंग संचालकों का बोलबाला बढ़ गया।

कपिल सिब्बल की यह सोच कि आईआईटी प्रवेश परीक्षा में कटऑफ मार्क्स 80-85 प्रतिशत तक हो जानी चाहिए, महात्मा गांधी की उस सोच के साथ मजाक है कि भारत के विकास के लिए सबसे पहले गांवों का विकास हो। यह बेतुकी शर्त है। इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है कि मैं सुपर 30 संस्थान के माध्यम से प्रत्येक वर्ष 30 निर्धन बच्चों को आईआईटी में प्रवेश परीक्षा की तैयारी पिछले 7 वर्षो से नि:शुल्क कराता रहा हूं और अब तक 182 बच्चे आईआईटी में दाखिला ले चुके हैं। लेकिन शायद ही कोई विद्यार्थी रहा होगा जिसे 12वीं में 80 या 85 प्रतिशत अंक मिले हों, और कमाल की बात तो ये है कि आईआईटी में जाने के बाद उन्होंने वहां भी शानदार शैक्षणिक प्रदर्शन किया।

क्या मानव संसाधन मंत्रालय को इसकी जानकारी नहीं है कि शहरी अमीर बच्चों के लिए यह संभव हो सकता है कि सीबीएसई के किसी बड़े स्कूल में पढ़कर वो 80-85 प्रतिशत तक अंक प्राप्त कर लें, लेकिन विभिन्न प्रादेशिक शिक्षा बोर्ड के उन बच्चों का क्या होगा जो गांव के ऐसे स्कूल में पढ़ते हैं जहां शिक्षक भी शायद ही नजर आते हैं। सिब्बल का कहना है कि बच्चे 12वीं की पढ़ाई नजरअंदाज कर सिर्फ आईआईटी की तैयारी में समय लगाते हैं। तो फिर क्यों नहीं आईआईटी ऐसे ही सवालों को पूछता जो चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ 12वीं कक्षा के सिलेबस पर आधारित हों। 

तीन साल पहले भी आईआईटी प्रवेश परीक्षा के पैटर्न में जो बदलाव किया था उसके पीछे तर्क था कि बच्चे स्कूल की पढ़ाई पर ध्यान देने के बजाए कोचिंग जाते हैं। बदलाव के तहत उन लोगों ने फिजिक्स तथा केमिस्ट्री में कुछ प्रयोगात्मक सवाल भी पूछने शुरू कर दिए। फिर भी अमीर बच्चों का स्कूल छोड़कर कोचिंग जाने का सिलसिला न तो बंद हुआ बल्कि मार उल्टे गरीब बच्चों पर पड़ी जो ऐसे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं जिसमें प्रयोगशाला दूर, खिड़की और दरवाजे तक नहीं हैं।

इसी हफ्ते एक टीवी इंटरव्यू के दौरान जाने माने शिक्षाविद प्रो. यशपाल के दावों को यदि सच माने तो आईआईटी जिस प्रश्नपत्र को बच्चों से 2 घंटे में हल करने की उम्मीद करता है उसे खुद आईआईटी के प्रोफेसर ही 10 घंटे में भी हल नहीं कर सकते। भारत के भविष्य के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण बात है इसका अंदाजा मानव संसाधन मंत्रालय को हो, तब कोई समाधान होगा। समय बदला है तो गरीब जनता भी जागरूक हो चुकी है। वह भी अब चाहती है कि उनके  बच्चे  खूब पढ़ें। बच्चों की पढ़ाई के लिए वह अपना खून-पसीना बहाने को तैयार हैं। उसे नजरअंदाज करके भारत को एक विकसित देश बनाने की बात कैसे सोची जा सकती है। आखिर देश को बाबू बनाने वाले मैकाले की शिक्षा पद्धति से छुटकारा दिलाना ही होगा।

इतिहास  गवाह है कि हंगरी और रूस में बदलाव का कारण सिर्फ आर्थिक ही नहीं, बल्कि 1894 में जे. वोन इटोवोस और डेलोन की नई शिक्षा पद्धति भी रही जिसने वहां आम लोगों के लिए अच्छी शिक्षा के द्वार खोले। बाद में अमेरिका ने भी इस पद्धति की नकल की और अब चीन जो इतनी तेजी से आगे बढ़ रहा है, वह भी इसी शिक्षा पद्धति का परिणाम है।

हमारे देश की शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए अभी बहुत काम करने की जरूरत है। कई देशों के सिलेबस के अध्ययन के बाद ऐसी शिक्षा पद्धति बनानी होगी जो सर्वसुलभ भी हो। अच्छे शिक्षक की बहाली और बाद में उनको युद्धस्तर पर प्रशिक्षित करने की योजना बनानी होगी। दो तरह के सिलेबस बनाने की जरूरत होगी। एक वैसे छात्रों के लिए जो सामान्य दर्जे के हैं और दूसरे जो मेधावी हैं। मेधावी बच्चों को स्कूल स्तर पर ही उच्च शिक्षा के लिए तैयार करना होगा। यही बच्चे होंगे जो देश की तस्वीर बदल देंगे।

(लेखक बिहार की प्रसिद्ध आईआईटी कोचिंग स्कीम ‘सुपर-30’ के संचालक हैं)

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