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यह तो आइडिया ही व्यर्थ था

क्या आईआईटी में प्रवेश के लिए 12वीं में 80 फीसदी अंकों की अनिवार्यता का प्रश्न उठाना उचित था ?
यह आइडिया ही व्यर्थ है क्योंकि हर बोर्ड में लर्निग स्टेज अलग-अलग है। यदि पूरे देश में सरकार 12वीं का एक राष्ट्रीय परीक्षा आयोजित करे तो फिर उसे ऐसे प्रावधान पर विचार करना चाहिए।

तो क्या एंट्रेंस परीक्षा में बैठने के लिए मौजूदा 60 फीसदी अंक सीमा की अनिवार्यता का प्रावधान जारी रहना चाहिए ?
इसका भी कोई औचित्य नहीं है। 55 फीसदी अंक पाने वाला भी जेईई में निकल सकता है और 65 फीसदी अंक पाने वाला फेल भी हो सकता है। इसलिए टेलेंट को चुनने का यह कोई सार्थक फार्मूला नहीं है। सरकार को चाहिए कि इन पचड़ों में फंसने की बजाय अमेरिका की तर्ज पर ग्रेजुएट रिकार्ड एग्जामिनेशन (जीआरई) शुरू कर दे जिसमें 12वीं करने के बाद सभी छात्रों को पंजीकृत करना होता है तथा इसके बाद ही उन्हें अमेरिका के किसी भी इंस्टीट्यूट, वि.वि. और कालेज में परसेंटाइल के आधार पर प्रवेश मिलता है।

तो फिर क्या होना चाहिए ?
यदि सरकार चाहती है कि ‘बेस्ट ब्रेन’ आईआईटी में पहुंचें तो इसके लिए बेहतर यह होगा कि हर एजुकेशन बोर्ड से 12वीं बोर्ड के परिणामों के आधार पर बेस्ट तीन सौ-चार सौ या जो भी संख्या सरकार निर्धारित करना चाहे, उन्हें चुन ले और उन्हें ही एंट्रेंस परीक्षा में बैठने दिया जाए। इसमें हो सकता है टॉप 300 में यूपी के 55 फीसदी अंक पाने वाले छात्र आ जाएं और सीबीएसई के 80 फीसदी अंक पाने वाले भी, लेकिन बोर्ड के रिजल्ट के आधार पर वे बेस्ट होंगे। इसका विरोध भी नहीं होगा।

लेकिन इससे तो कोचिंग का शिफ्ट बोर्ड परीक्षा की तरफ हो जाएगा। स्टुडेंट तब बोर्ड के लिए कोचिंग लेंगे। तो फर्क क्या हुआ ?
यदि परीक्षा में बैठने वाले स्टुडेंट की संख्या सीमित कर दी जाए तो कोचिंग घटेगा। दूसरे, बोर्ड परीक्षा की कोचिंग और आईआईटी एंट्रेंस की कोचिंग में फर्क है। दोनों में छात्रों की प्रतिभा को परखने का पैमाना अलग-अलग है। बोर्ड में याद करना होता है जबकि आईआईटी एंट्रेंस में प्रतिभा देखी जाती है, लेकिन कोचिंग संस्थानों ने इसमें भी सेंध लगा दी है। 

प्रस्तुति : मदन जैड़ा

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