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हुड्डा के विकास के दावे को जनता ने नकारा

भूपेन्द्र सिंह हुड्डा सरकार के विकास के दावों में कितना दम था इस बात पर हरियाणा की जनता ने अपनी राय दे दी है। पिछली दफा किसी एक दल को 67 सीटों का अभूतपूर्व समर्थन देने वाले लोगों ने आज कांग्रेस को समेट कर 40 सीटों पर ला खड़ा किया है। यानि उसे सामान्य बहुमत के लिए भी तरसा दिया है जैसे पिछली बार इनेलो प्रमुख ओम प्रकाश चौटाला को नौ सीटों पर समेट कर प्रतिपक्ष के नेता पद की दहलीज़ पर ही रोक दिया था।

मतदाता का कांग्रेस के प्रति नाराज़गी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने विपक्ष के बिखराव का फायदा भी पूरी तरह कांग्रेस को नही उठाने दिया। जानकार लोग कांग्रेस की हार में रोहतक की चौधराहट के नारे का काफी हाथ मानते हैं। उनके अनुसार इस नारे ने हुड्डा को रोहतक तथा आसपास के ज़िलों तक ही सीमित कर दिया। वे प्रदेश के नहीं बल्कि रोहतक के मुख्यमन्त्री बनकर रह गए। विपक्ष की लम्बे समय से शिकायत चली आ रही है कि विकास सिर्फ रोहतक व उसके आसपास हो रहा है।

मतदाता ने इस शिकायत पर मोहर लगाते हुए मुख्यमन्त्री हुड्डा को दण्डित किया है। रोहतक की चौधर के नारे को यदि देखा जाए तो उसने हुड्डा को सारे जाटों का भी नेता नहीं बनने दिया। हरियाणा में जाटों के दो वर्ग क्रमश: देसवाली और बागड़ी है। रोहतक, झज्जर तथा सोनीपत देसवालियों का इलाका कहलाता है। जबकि जींद, हिसार, सिरसा, भिवानी, फतेहाबाद आदि बागड़ी जाटों के ज़िले हैं जो चौटाला का वर्ग है।

इन दोनों के बीच हुड्डा ने कितना जबर्दस्त विभाजन किया उसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि बागड़ी बहुल फतेहाबाद निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी दूड़ा राम हारने के बावजूद वहां के तीन देसवाली जाटों के गांवों क्रमश: गोरखपुर, नहला और दहमण से उसे बढ़त मिली क्यों कि वहां हुड्डा ने उसके पक्ष में प्रचार किया था।

इस विभाजन का असर इतना जबर्दस्त हुआ कि जींद पूरी तरह कांग्रेस के हाथ से निकल गया। यहां तक कि पार्टी का कद्दावर नेता और वित्त मन्त्री बीरेन्द्र सिंह तक यहां के उचाना क्षेत्र से चौटाला से हार गया। चौटाला ने उचाना के अलावा ऐलनाबाद से भी चुनाव लड़ा था।

हुड्डा पर क्षेत्रवाद और जाटवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं, जिन्हें मतदाताओं ने भी सही साबित किया है। उन पर आरोप लगा कि विकास के अलावा नौकरियां भी देसवाली इलाके के लोगों को ही बांटी गई। सरकार ने किसानों के कर्जे माफ करने तथा उन्हें तमाम अन्य सहूलियतें देने के जो दावे किए गए वे भी जाटों को फायदा देने वाले ही थे क्यों कि हरियाणा में किसान का मतलब अमूमन जाट ही होता है।

यह भी आरोप लगते रहे कि हुड्डा के पास विज़न की कमी है। सारी सरकार अफसरों के भरोसे ही चल रही है। वैसे एक बार तो कांग्रेस विधायकों ने मुख्यमन्त्री से कहा भी था कि अफसरशाही इस कदर हावी हो गई है कि चुने हुए प्रतिनिधियों की बात भी नहीं सुनती।

यह बात सही है कि हुड्डा की छवि एक ईमानदार और शरीफ नेता की है, लेकिन आज के नतीजों से संदेश मिलता है कि मतदाता ईमानदार और शरीफ नेता के साथ ही ऐसा नेता चाहते हैं जो उनकी सुने, प्रदेश का समानरूप से विकास करे और किसी एक जिले, जाति, वर्ग या क्षेत्र का बन कर रहने के बजाए सारे प्रदेश का बन कर रहे।

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