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पदोन्नति की तदर्थ व्यवस्था से अजा कर्मियों की हकमारी

यह पदोन्नति की तदर्थ व्यवस्था है या अनुसूचित जाति जनजाति के अधिकारियों और कर्मचारियों की हकमारी की सजिश! प्रोन्नति होती नहीं लेकिन अपने ही वेतनमान में वर्षो डटे रहते उच पदों पर। फामरूला कोई नया नहीं है। हां़, प्रचलन थोड़ा तेज हुआ है। आजकल अधिसंख्य विभाग इसी फामरूले पर काम कर रहे हैं। जुगत भिड़ा लेने में सफल लोग मलाई मार रहे हैं और प्रोन्नति के हकदार अनुसूचित जाति के कर्मचारी और अधिकारी अपने मूल पद पर ही रिटायर हो जाते हैं।

 कई विभागों में अधिकारियों की प्रोन्नति का मामला वर्षों से लंबित है। अब रिक्त पड़े उच्च पदों पर अपने ही वेतनमान में निम्न पद पर काम करने वाले अधिकारियों की पोस्टिंग का सिलसिला चल पड़ा है। विधानसभा में सरकार भी यह स्वीकार कर चुकी है कि ऐसे मामलों में अजा/जजा कर्मियों व अधिकारियों की ‘अनदेखी’ हो रही है। राजद के अब्दुलबारी सद्द्ीकी के सवाल पर सरकार ने कहा है कि पशु शल्य चिकित्सकों और अनुमंडल पशुपालन पदाधिकारियों के कुल 75 पदों में मात्र दो पर ही अनुसूचित जाति के पदाधिकारी हैं।

वह भी सिर्फ अनुमंडल स्तर पर, जिला स्तर पर वीएस के पद पर अजा के एक भी अधिकारी नहीं हैं। यही हाल बिजली, सिंचाई तथा कई दूसरे विभागों में भी है। अधीक्षण अभियंता और उससे ऊपर के पदों पर अधिसंख्य अधिकारी कार्यकारी व्यवस्था के तहत अपने ही वेतनमान में काम करे रहे हैं। उनमें अजा अधिकारियों की संख्या बहुत कम है। अगर रेगुलर पोन्नति हो तो अधिसंख्य पदों पर अजा/जजा अधिकारियों का कब्जा होगा। नियम के अनुसार 55 दिन तक के लिए की गई ऐसी व्यवस्था में ही आरक्षण के प्रावधानों को शिथिल किया जा सकता है।

लेकिन कार्मिक और प्रशासकि सुधार विभाग ने महाधिवक्ता की राय लेकर यह व्यवस्था की है कि उच्च पदों को भरने की तदर्थ व्यवस्था में आरक्षण के नियमों का पालन करना जरूरी नहीं है। विभाग की इस व्यवस्था के खिलाफ अनुसूचित जाति कर्मचारी संघ ने आपत्ति जताई है। संघ के अध्यक्ष रामचन्द्र राम ने कहा है कि इससे अनुसूचित जाति के कर्मियों की हकमारी हो रही है।

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  • Web Title:पदोन्नति की तदर्थ व्यवस्था से अजा कर्मियों की हकमारी