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कलयुग के श्रवण कुमार हैं 'वीरेंद्र कुमार'!

कलयुग के श्रवण कुमार हैं 'वीरेंद्र कुमार'!

उत्तर प्रदेश का एक युवक त्रेतायुग के श्रवण कुमार जैसी मिसाल पेश कर रहा है। प्रदेश के सीतापुर जिले के चांदपुर गांव निवासी 21 वर्षीय वीरेंद्र कुमार वर्मा अपनी मां को कंधे पर लादकर हरिद्वार धाम की पैदल यात्रा पर निकला है।

पीला कुर्ता और सफेद पायजामा पहने वीरेंद्र कंधे पर एक बड़ा बांस लटकाए हुए है, जिसके दोनों तरफ टोकरियां लटकी हुई हैं।  एक टोकरी पर सफेद साडी पहने उसकी 58 वर्षीय मां सावित्री देवी है, तो दूसरी टोकरी पर यात्रा के दौरान का जरूरत का सामान, जो संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।

वीरेंद्र कुमार ने एक बातचीत में कहा कि वह कोई अनोखा काम नहीं कर रहा है। यह उसका कर्तव्य है कि अपनी मां की हरिद्वार दर्शन की इच्छा वह इस जन्म में पूरी कराए। वीरेंद्र के मुताबिक उसकी मां ने पिता जगदीश प्रसाद के साथ हरिद्वार धाम यात्रा की योजना बनाई थी, लेकिन दो महीने पहले पिता का बीमारी के चलते देहांत हो गया। पैसे की किल्लत के चलते मां की हरिद्वार यात्रा को पूर्ण करने के लिए ऐसा करने के सिवा उसके पास कोई दूसरा चारा नहीं था।

दस दिन पहले अपने गांव चांदपुर से वीरेंद्र ने मां को कंधे पर लादकर अपनी यात्रा शुरू की थी। अब तक वह 35 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर जिले के रोतीगोदाम इलाके तक पहुंचा है। वीरेंद्र के मुताबिक पिछले कुछ दिनों से उसकी मां की तबियत खराब है। इसलिए यात्रा के दौरान जहां भी उन्हें थकान और कमजोरी महसूस होती है, उसे रुकना पड़ता है और वहीं पर छोटा-सा तंबू लगा लेता है।

वीरेंद्र जिस रास्ते से मां को लेकर गुजर रहा है, उसे देखने वालों का तांता लग जाता है। लोग उसके इस प्रयास की सराहना कर रहे हैं। कोई उसे पैसे से तो कोई उसे भोजन व फल देकर भरपूर सहयोग कर रहा है। परसेंडी प्राथमिक विद्यालय की अध्यापिका कल्पना निगम कहती हैं कि आज के जमाने में जहां अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद औलादें अपने मां-बाप को भूल जाती हैं। उसी जमाने में वीरेंद्र कुमार जैसे बेटे को देखकर अचम्भा होता है।

उन्होंने कहा कि हम वीरेंद्र को पैसे, भोजन और अन्य दैनिक वस्तुओं की मदद दे रहे हैं ताकि उसे अपने गंतव्य तक सहज पहुंच सके। स्थानीय मोहन शर्मा ने कहा कि वीरेंद्र को देखकर लगता है कि वह कलयुग का श्रवण कुमार है। आज के जमाने में मां-बाप के प्रति बेटे का इस तरह का समर्पण देखकर आश्चर्य होता है।

वीरेंद्र ने हरिद्वार पहुंचने के लिए कोई समय सीमा नहीं निर्धारित की है। वह कहता है कि उसे भरोसा है कि मां के आशीर्वाद और अपने प्रयास से वह जल्द ही 400 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर हरिद्वार पहुंच जाएगा।

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