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दो टूक (22 अक्तूबर, 2009)

विश्वास और अंधविश्वास के बीच बड़ी बारीक लकीर है। लकीर मिटी नहीं कि खतरा तैयार बैठा है। दिवाली पर महालक्ष्मी को प्रसन्न करने की ख्वाहिश किसे नहीं होती। इसीलिए लक्ष्मी पूजा होती है। यह विश्वास है महालक्ष्मी को बुलाने का। लखनऊ की एक खबर के मुताबिक एक सज्जन ने जब तक यह किया तो ठीक-ठाक था। मगर उन्हें किसी ने लक्ष्मी बुलाने की एक और सलाह दे डाली।

सलाह थी, दिवाली के बाद कई दिनों तक अगर घर के दरवाजे और खिड़कियाँ खुली रखी जाएँ तो देवी लक्ष्मी निर्बाध आएँगी। लेकिन हुआ उलट। एक दिन चोरों की मंडली चली आई। घर में जो कुछ भी था समेट कर चल दी। जनाब, विश्वास ठीक है लेकिन बुद्धि किनारे कर दें तो अंधविश्वास का शक्ल अख्तियार करने में उसे देर नहीं लगती। यह जो हुआ, इसे अंधविश्वास ही कहेंगे। कर्महीन विश्वास।

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  • Web Title:दो टूक (22 अक्तूबर, 2009)