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अफगानिस्तान में फौज तैनात करने का वक्त

काबुल में भारतीय दूतावास के बाहर यह लगातार दूसरा हमला था। और पहली बार की ही तरह इसने भी अफगानिस्तान में काम कर रहे भारतीय कर्मचारियों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा दिया। ये कर्मचारी अफगानिस्तान में शिक्षा, स्वास्थ्य और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसी कई परियोजनाओं में काम कर रहे हैं। वे अफगानिस्तान में संसद भवन बना रहे हैं, सड़के बना रहे हैं, पूरे देश में विद्युत और संचार सुविधाओं का ताना-बाना बुन रहे हैं।

अभी कुछ ही दिन पहले भारत ने 202 किलोमीटर लंबी पावर ट्रांसमिशन लाइन तैयार की है, जिससे काबुल को बिजली मिलेगी। इसके अलावा वे जरूरतमंद लोगों को भोजन और दवाएं उपलब्ध कराने जैसे मानवीय काम भी कर रहे हैं। अगर ऐसे हमले होते रहे तो अफगानिस्तान को फिर से अपने पांवों पर खड़े करने की कोशिशों को आघात पहुंचेगा। इस काम में दुनिया की कई दूसरी ताकतें भी सक्रिय हैं।

फर्क सिर्फ इतना है कि उनके जो लोग वहां काम कर रहे हैं, उनमें ज्यादतर सेना के लोग हैं। जबकि वहां काम कर रहे भारतीय नागरिक हैं। वे डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं, अध्यापक हैं, निर्माण मजदूर हैं। इन लोगों ने अफगानिस्तान में भारतीय राजनय को एक मजबूती दी है और उन्हें स्थानीय समर्थन भी हासिल हुआ है। लेकिन इस कोशिश में उन्होंने एक जोखिम भी मोल लिया है।

तालिबान के ताजा हमले ने एक बात तो जाहिर कर दी है कि इस समय जब तालिबान की हिंसा फिर से बढ़नी शुरू हुई है, भारत को अफगानिस्तान में नई चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए। यह हमला उस समय हुआ है, जब अमेरिका अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या में कटौती की बात करने लगा है। राष्ट्रपति बराक ओबामा भी उलझन में हैं कि वहां तैनात जनरल स्टेनले ए मैकक्रिस्टल की सलाह मानते हुए अपने सैनिकों की संख्या बढ़ाएं या फिर कटौती की अपनी योजना पर चलते रहें। कुछ लोग यह मान रहे हैं कि तालिबान अब अमेरिका के लिए खतरा नहीं रहे, जबकि एक दूसरी सोच यह है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी से अल कायदा मजबूत होगा और वह फिर से हमले शुरू कर देगा।

इसके साथ ही अब भारत को भी अफगानिस्तान पर अपनी सोच बदलनी होगी। यह ठीक है कि अफगानिस्तान में जो अच्छे काम हो रहे हैं, वे जारी रहने चाहिए। साथ ही इस बात को भी फिर से कहना होगा कि भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकवाद से लड़ाई का एक मोर्चा अफगानिस्तान भी बना रहेगा। लेकिन इसी के साथ अब भारत को अफगानिस्तान में अपनी फौज तैनात करने पर भी गंभीरता से सोचना चाहिए।

मामले को इस तरह से देखना होगा कि अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से भारत को कितना खतरा है। तालिब हुकूमत अगर अफगानिस्तान में आती है तो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भारत को अमेरिका के मुकाबले ज्यादा खतरा होगा। अमेरिका जब अफगानिस्तान में अपनी भूमिका सीमित करने की बात करता है, जब वह उदार तालिबान से बात करने की कोशिश करता है, जब वह खुद को आर्थिक मदद देने और अफगान फौज को प्रशिक्षण देने तक सीमित करने के बात करता है तो दुनिया भर के कई देश उसकी आलोचना करते हैं। ऐसे में भारत को इस क्षेत्र में स्थिरता लाने की अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाए अपनी भूमिका को छोटे-मोटे काम तक सीमित क्यों कर लेना चाहिए?

अगर तालिबान अफगानिस्तान में लौटते हैं तो जेहादी फिर से पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी राजनय के हथियार बन जाएंगे जिनका इस्तेमाल भारत के ही खिलाफ होगा, और भारत की सरजमीं पर ही होगा। सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि जेहादियों से कौन ज्यादा बेहतर ढंग से टक्कर ले सकता है? देश की फौज या देश के नागरिक? जेहादी देश के भीतर, इसकी सड़कों, इमारतों, रेलवे स्टेशनों पर आम नागरिकों को निशाना बनाएं, क्या इससे बेहतर यह नहीं है कि देश की फौज अफगानिस्तान के निजर्न मैदानों में जेहादियों को टक्कर दे?
 
अभी अमेरिका के पास अफगानिस्तान के लिए एक रणनीति है, और वह वहां टिकना भी चाहता है, लेकिन उसके पास इतनी फौज नहीं है कि वह उस रणनीति को लंबे समय तक चला सके। भारत वहां अपने सैनिकों को तैनात करके उसकी मदद कर सकता है। सिर्फ तरह-तरह के विकास कार्य करने से ही यह काम नहीं हो सकेगा। अगर भारत सिर्फ अफगान फौज को प्रशिक्षण देने का काम ही करता है तो भी उसे प्रशिक्षकों, सलाहकारों और सहायकों वगैरह की फौज की जरूरत होगी जो इस काम के लिए अफगानिस्तान में तैनात हो। सिर्फ इतना काम भी अफगानिस्तान में पूरी तरह फौज तैनात करने से एक कदम कम ही होगा। लेकिन इन दोनों के नतीजे एकदम फर्क होंगे।

और जहां तक पाकिस्तान की बात है तो भारत किसी भी स्तर पर अफगानिस्तान में सक्रिय हो, पाकिस्तान तो विरोध करेगा ही। भारत ने अपनी भूमिका को बहुत सीमित रखा है, फिर भी वह बोल ही रहा है। इसकी परवाह भी किसे है। फाटा में ड्रोन का हमला हो या फिर क्वेटा शूरा में ऑपरेशन पाकिस्तान में इस समय जो भी हो रहा है, सब अमेरिका की इशारे पर ही हो रहा है।

चीन के खतरे को लेकर इस समय मीडिया में जिस तरह का हंगामा चल रहा है, उसे देखते हुए इस समय चीन की सीमा पर तैनात फौज को कम नहीं किया जा सकता। लेकिन अगर फौज में कटौती पाकिस्तानी सरहद पर की जाती है तो पाकिस्तान का यह तर्क बेमतलब हो जाएगा कि भारत से खतरे की वजह से वह जेहादियों के खिलाफ अपनी मुहिम पूरी ताकत से नहीं चला सकता।

उधर जम्मू-कश्मीर में हिंसा थोड़ी कम हुई है, इसलिए हम राष्ट्रीय रायफल के उन सैनिकों को अफगानिस्तान में तैनात कर सकते हैं जिन्होंने आतंकवादियों से लड़ने में दक्षता हासिल की है। इससे एक तो हम जम्मू-कश्मीर से फौज हटाने का अपना मकसद भी पूरा कर सकेंगे साथ ही पाकिस्तानी जेहादियों से जंग के मैदान को कश्मीर से अफगानिस्तान स्थानांतरित कर देंगे। भारत को उनसे लड़ना तो होगा ही, अब उसे यह तय करना है कि यह लड़ाई वह कब और कहां करना चाहता है। इसके लिए भारत को तीसरी दुनिया के अविकसित और गुट-निरपेक्ष देश वाली पुरातन मानसिकता को छोड़ना होगा। एक उभरती हुई ताकत के रूप में भारत को कुछ जिम्मेदारियां अपने कंधों पर लेनी चाहिए।

harsh.pant @kcl. ac. uk

लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक हैं

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