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छठ पूजाः सूर्य से हमारा रिश्ता

सूर्य न होता तो पृथ्वी न होती, दिन-रात न होते, गर्मी, बरसात, जाड़ा और वसंत न होता। और जीवन भी न होता। हम सब न होते। इन्हीं का आख्यान है, लघु परम्परा का महान त्योहार डाला छठ और कार्तिक छठ पूजा। इनके प्रचलित आख्यान हैं। लेकिन पहले सूर्य के बारे में।

दूर से देखने में सूर्य एक गोलाकार बिंब में अवस्थित गैसों के समुच्चय के व्यापक प्रकाश की किरणें बिखेरने वाला तारा है। देखने में ऐसा लगता है कि यह पृथ्वी की भांति ठोस आकार लिये हुए है। लेकिन सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली प्रकाश की किरणें दरअसल इसकी नाभि में होने वाले सतत् न्यूक्लीय विस्फोटों के कारण हैं।
  
विस्फोटों से उत्सर्जित उर्जा नाभि से चलकर इसके फोटोस्फेयर सतह से होते हुए अंतरिक्ष में पदार्पण करती हैं। खगोलविदों के अनुसार नाभि के विस्फोट से उत्सर्जित उर्जा 15 एमके (एम के मिलियन केलविन्स) के बराबर होती है जो फोटोस्फेयर पर आते-आते 6000 के आसपास रहती है। 15 एम के की उर्जा न्यूक्लीय विस्फोट के लिए आवश्यक है जिसकी सूर्य को जरूरत है।

लेकिन रहस्यमय कारणों की वजह से 6000 के की फोटोस्फेयर पर उपलब्ध उर्जा शक्ति कोरोना (सूर्य के घेरे) पर आते समय एक एमके के बराबर होती है। कोरोना की इस शक्ति को समझना सूर्य की पारिस्थतिक भौतिकी को समझने के लिए आवश्यक है। यह सूर्य-पृथ्वी के सम्बन्ध की समझ के लिए भी जरूरी है।

यानी सूर्य अजस्त्र उर्जा का केन्द्र है जो हमारे सौर मंडल की समस्त गतिविधियों का संचालक है। स्वाभाविक है कि हमारी सभ्यता के उत्स से ही मानव समूह सूर्य से या तो भयभीत रहे अथवा उसे प्रत्यक्ष देवता मानकर पूजते रहे। आदिवासी समाज में या प्राचीन सभ्यताओं में सूर्य उपासना का प्रचुर उल्लेख है। ब्रह्मांड में सूर्य को शक्ति, प्रभाव, प्रकाश, जीवन, शक्ति, ओज अथवा दुर्भिक्ष का कारण माना गया।
 
हमारे पुराणों के महत्वपूर्ण अंशों में सूर्य समय और स्थान के परे वंश का पुंसत्व का प्रतीक माना गया। जाने माने भूगोलविद प्रो़  राणा पीबी सिंह का कहना है कि बहुत सी पुरानी संस्कृतियों तथा सभ्यताओं में सूर्य देवी के रूप में पूजित हैं जैसे ग्रीक में आएना जो सिसिली के एटना पर्वत में स्थित ज्वालामुखी की प्रतीक है, हिनी की सूर्य देवी एरिना जो युद्ध की विभिशिका से बचाती है, बास्क की सूर्य देवी एरवी जिसके प्रकाश की एक किरण समूची बुराई के तत्वों का विनाश कर देती है, नार्स की सूर्य देवी जो स्को नाम के भेड़िये को आकाश में खदेड़ देती है अथवा कागाबा (कोलंबियन आदिवासी) की सूर्य देवी अलूना जो समस्त सृष्टि की सृजनकर्ता है।
 
काशी की आर्य पूर्ववर्ती संस्कृति में भी सूर्य को शक्तिरूपा माना गया है, स्वयं काशी का अर्थ ही प्रकाश है तथा एक प्राचीन नाम  ‘अलकापुरी’ भी सूर्य नगरी को इंगित करता है । इसलिए सूर्य की देवी के रूप में उपासना विश्व में अधिक प्रचलित है।

वैदिक परम्परा में भी अनेक मंत्र ऐसे हैं जो सूर्य को समर्पित हैं। जिन्हें सवितुर (प्रेरक) कहा गया। सर्वग्राह्य गायत्री मंत्र इसका सर्वथा उदाहरण है। भारतीय परम्परा में और धर्म में देवी बहुस्वरूपा हैं तथा वह सृष्टि की ‘माया’ और ‘प्रकृति’ हैं। इसके अनुसार सूर्य देवता भी देवी स्वरूपा हो जाते हैं। वैदिक युग के प्राचीन आख्यान के अनुसार जिन दैवीय शक्तियों ने सूर्य देवता की रचना की वह गायत्री कहलायी तथा विभिन्न हिन्दू देवियां उसी की प्रतिस्वरूपा हैं।

महर्षि विश्वमित्र ने ऋगवेद के उस पवित्र मंत्र का उल्लेख किया है जो प्राकृतिक अजस्त्र उर्जा के प्रतिस्वरूप गायत्री मंत्र के रूप में जाना जाता है जिसका भाव है कि हम सूर्य के आशीर्वाद से गायत्री के कृपापात्र होकर मन को जागृत करें। प्रो़ राणा का कहना है कि ऋगवेद गायत्री को पृथ्वी पर जीवन संगीत (ध्वनि) तथा ब्रह्मांड (कास्मिक) व्यवस्था का प्रतीक मानता है तथा इसी प्रकार पृथ्वी को ब्रह्मांड से जोड़ता है। विष्णु पुराण का एक आख्यान है कि सूर्य ने विश्वकर्मा की पुत्री तथा बाद में छाया से विवाह किया।

पहली पत्नी से उन्हें जो पुत्र उत्पन्न हुआ वह यम (मृत्यु) था। इसलिए सूर्य की उपासना ‘छठ पूजा’ मृत्यु के भय से अथवा दीर्घ जीवन की कामना को लक्षित करता है। छठ पूजन, ब्राह्मण परम्परा से भी प्राचीन जान पड़ता है क्योंकि इसमें किसी पुरोहित को नहीं बुलाया जाता बल्कि परिवार की ही कोई बुजुर्ग महिला यह पूजन सम्पन्न कराती हैं।
छठ पूजा केवल साधारण धार्मिक उत्सव न होकर बिना इसके बौद्घिक संदेश अथवा वैज्ञानिक कारणों को जानते हुए आस्था की अनुगूंज तथा उसके सतत् प्रवाह का आख्यान है। इसने अब लघु परम्परा से आगे जाकर धार्मिक उत्सव का रूप ले लिया है।

लेखक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सम्बद्घ हैं

pandeyvnp@rediffmail.com

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