DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

प्रगति का अर्थ

प्रगति उसी को कहेंगे जहाँ मनुष्य की गति है - भैतिक-मानसिक तथा मानसिक-आध्यात्मिक। यह भौतिक-मानसिक गति क्या है, समाज के जितने मनुष्य हैं, सबों को साथ लेकर चलूँगा। साधक केवल अपने आगे बढ़ेंगे और दुनिया के और व्यक्ति पीछे रह जाएँगे-यह मनोभाव साधक का नहीं है। इसलिए कहा जाता है कि साधना का अन्यतम अंग है तप। तप माने अपने स्वार्थ की ओर नहीं ताकना, ताकना समाज के हित पर। सामूहिक कल्याण की भावना जहाँ है, व्यक्तिगत कल्याण उसमें हो या न हो, उसी का नाम है तप। तप का सर्वोत्तम उपाय है जनसेवा।

जनसेवा से आध्यात्मिक तरक्की तो अवश्य होती है। क्योंकि जो जनसेवा करते हैं, वे सेवा करते वक्त सेवा को नारायण समझ कर करते हैं, मनुष्य समझ कर नहीं। इसलिए जनसेवा से आध्यात्मिक उन्नति तो अवश्य ही होती है, इसके अतिरिक्त क्या होता है? मन अत्यन्त निर्मल हो जाता है। उस निर्मल मन से मनुष्य जो भी कुछ करेगा, उसी में उनकी जय-जयकार है। मनुष्य साधना में बैठता है और मन इधर-उधर दौड़ाता है, किन्तु जो जनसेवा करता है, जो तप ठीक से करता है, उस वक्त उसके मन में और कोई भावना आती है तो कौन-सी भावना आती है?

जनसेवा संबंधी भावना। तो जनसेवा संबंधी यह जो भावना है, उसमें जन को अर्थात् मनुष्य को वे नारायण समझते हैं। इसलिए उस वक्त जनसेवा संबंधी भावना से भी उनकी अधोगति नहीं होती है। इसलिए कहा जाता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए तथा मन को निर्मल बनाने के लिए जनसेवा एक अत्यावश्यक साधना का अंग है। इसी जनसेवा से मनुष्य अनुभव करते हैं कि उन पर परमात्मा की कृपावर्षा हो रही है। साधारण मनुष्य अपना स्वार्थ और व्यक्तिक स्वार्थ लेकर जप करते हैं, वे शिकायत करते हैं कि और लोगों पर परमात्मा की कृपावर्षा हो रही है, केवल मुझ पर नहीं हो रही है। मगर जो जनसेवा में व्यस्त हैं, जनसेवा में आत्मनियोग किए हैं, वे हर मुहूर्त्त में अनुभव करेगें कि उनपर परमात्मा की कृपा वर्षा हो रही है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:प्रगति का अर्थ