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शांति की पहल

माओवादी हिंसा की चुनौती बढ़ते जाने के बावजूद गृहमंत्री पी. सी. चिदंबरम ने लोकसभा के पूर्व स्पीकर रवि राय के माध्यम से बातचीत का जो प्रस्ताव रखा है, वह सराहनीय है। हालांकि गृहमंत्री ने बातचीत के लिए हिंसा रोकने और हथियार डालने को आवश्यक बताया है, जबकि शांति के लिए नागरिक पहल शुरू करने वाले रवि राय का कहना है कि वार्ता के लिए कोई पूर्व शर्त नहीं रखी जानी चाहिए। उधर भाकपा (माओवादी) के दो प्रमुख नेताओं गणपति और किशनजी ने हाल में हिंसा और संघर्ष को सही ठहराया है। 

इन स्थितियों में एक तरह की पैंतरेबाजी भी दिखती है और शांति की गुंजाइश भी। पैंतरेबाजी इन अर्थो में कि सरकार किसी भी कठोर कार्रवाई के पहले शांति के सारे उपाय आजमा लेना चाहती है, ताकि देश का मीडिया और नागरिक समाज कहीं से उसे दमनकारी होने का दोष न दे। इस काम में सरकार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और तटस्थ राजनीतिक व्यक्तियों का इस्तेमाल कर रही है।

दूसरी तरफ यही काम माओवादी भी कर रहे हैं। जब भी कठोर कार्रवाई की तैयारी होती है तो वे सामान्य आदिवासी और दलित समूहों को ढाल बनाते हैं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के माध्यम से अपने मुद्दे को सरकार और व्यापक समाज के सामने रखते हैं। इसी के साथ वे छापामार कार्रवाई जारी भी रखते हैं, ताकि उन्हें नखदंत विहीन न मान लिया जाए।
   
इसीलिए हिंसा का समर्थन करते हुए भी माओवादी नेता किशनजी ने अर्धसैनिक बलों को हटा लेने की मांग करते हुए शांति के एक गलियारे की तरफ संकेत किया है। इस सिलसिले में हाल में ही विदा हुए डॉ के. बालगोपाल जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं की मध्यमार्गी भूमिका काफी महत्व की हो जाती है। वे नक्सली हिंसा के पूरी तरह खिलाफ थे और दूसरी तरफ फर्जी मुठभेड़ों में उन्हें मारे जाने का भी विरोध करते थे। शायद रवि राय और अरुणा राय जैसे राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उसी तरह की भू्मिका अपनाने की पहल की है।

अच्छी बात यह है कि सरकार इस पहल को नजरंदाज नहीं कर रही है, बल्कि उससे आगे बढ़ कर यह भी कह रही है कि माओवादी आखिरकार इस देश के नागरिक ही तो हैं। सरकार ने खाद्य सुरक्षा, भूमि और वन अधिकार व न्याय के मुद्दों पर वंचितों के हित रक्षा का आश्वासन भी दिया है। धोखाधड़ी के खतरों के बावजूद इस पहल की कामयाबी सभी के हित में है।

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