DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

प्राथमिक विद्यालयों में गिरता शिक्षा स्तर

शिक्षा सभी के लिए आवश्यक है, अत: सरकार कई योजनाएं भी चलाती है। उनमें से एक सर्व शिक्षा अभियान भी है, जिसके तहत कक्षा 8वीं तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा का प्रावधान है। यह अभियान पूरे उत्तराखंड में चल रहा है। सरकार ने नियम-कानून तो बना दिये, लेकिन इसके बाद अपना पल्ला झाड़ लिया। पहाड़ी क्षेत्रों के विद्यालयों में विद्यार्थी तो हैं, किन्तु शिक्षक नहीं। यहां विद्यालय एक ही शिक्षक से चलता है और यदि किसी शिक्षक का स्थानांतरण यहां हो जाता है तो वह अपना मेडिकल या अपने घर की कोई परेशानी बताकर अपना स्थानांतरण शहरी क्षेत्रों में करवा लेता है। अगर पहाड़ी क्षेत्र के प्रत्येक विद्यालय में 3-4 शिक्षक अनिवार्य कर दिए जाएं तो शिक्षा में सुधार हो पायेगा तथा विद्यार्थियों का शिक्षा स्तर भी ऊंचा उठेगा। पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकतर एक ही अध्यापक या शिक्षा मित्र रहता है। जिससे वे न तो बच्चों को समुचित शिक्षा दे पाते हैं और न मिड-डे मील जैसे प्रोजेक्ट को पूर्ण कर पाते  हैं।
प्रीतिराज, मास कॉम, देहरादून

बंद और हम
आए दिन होने वाले बंद से सबसे ज्यादा परेशानी गरीब जनता को ही उठानी पड़ती है। साथ ही देश को करोड़ों का नुकसान भी होता है। हमें समझना होगा कि बंद किसी समस्या का हल नहीं है। 2 अक्तूबर गांधी जयंती पर विभिन्न संगठनों ने स्थायी राजधानी गैरसैंण एवं अन्य मांगों को लेकर जो बंद किया वह हास्यास्पद है। अब तो नेताओं से लेकर राजधानी चयन कमेटी तक ने भी साफ कह दिया है कि उत्तराखंड की स्थायी राजधानी देहरादून ही रहेगी। जिस प्रकार से देहरादून में शुरू से ही लगभग सभी कार्य हो रहे हैं और हर विभाग, सचिवालय, विधायक निवास आदि को विकसित किया गया है, उसको देखते हुए अब सब नेताओं को अपनी-अपनी तुच्छ राजनीति छोड़कर और राज्य पर ज्यादा बोझ न डालकर राजधानी कमेटी आदि को भी भंग कर खुले तौर पर देहरादून को स्थायी राजधानी घोषित कर देना चाहिए।
बुलबुल लखेड़ा, बालावाला, देहरादून

दिनोंदिन बढ़ता प्रदूषण
जिस तरह से उत्तराखंड के तीर्थ स्थलों पर पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है, वह पूरे भारतीय जन मानस के लिए शुभ संकेत नहीं है। भारत की आधी जमीन को हरियाली तथा खुशहाली से महकाने वाली गंगा-यमुना के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। सरकार के गंगा एक्शन प्लान जैसी योजनायें महज ढिंढोरा पीटने जैसी रह गयी हैं। गौरतलब है कि इस वर्ष उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में बेहद कम बारिश हुई। गर्मी का आलम यह कि पहाड़ों का तापमान दिल्ली से ऊपर पहुंच गया। हिमालयीय क्षेत्र के ग्लेशियरों का दायरा साल-दर-साल सिमटता जा रहा है। देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में बढ़ते प्रदूषण से पर्यटन प्रदेश के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न् लग गया है। नदियों के उद्गम माने जाने वाले चार धाम तो बुरी तरह प्रदूषण से प्रभावित हैं। साल-दर-साल यात्रियों की संख्या में भारी इजाफे के साथ नॉन बायोडिग्रेवल, कूड़ा-करकट का अंबार भी बढ़ता जा रहा है। घोड़े-खच्चरों के मल से पूरे रास्ते गंदगी रहती है। शौचालय की पर्याप्त व्यवस्था न होने से लोग जगह-जगह शौच करते हैं।  बेतरतीब निर्माण व अव्यवस्था से तीर्थ स्थानों की धार्मिकता पर भी प्रश्न चिह्न् लगा दिया है। आखिर सरकार इस ओर की कब सुध लेगी।
शंकर प्रसाद तिवारी, गुप्तकाशी

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:प्राथमिक विद्यालयों में गिरता शिक्षा स्तर