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तोहे जब बैरन नींद न आए..

हमारी आज की जीवनशैली कुछ ऐसी हो चुकी है कि जागे हैं तो सोये-सोये से और सो रहे हैं तो भागदौड़ की चिंता में जगे-जगे से। किसी के पास भरपूर नींद लेने का वक्त नहीं है और कोई वक्त पर नींद न आने से झुंझलाया हुआ है। भले ही कहने-सुनने में यह साधारण-सी बात लगती है, लेकिन यह स्लीपिंग डिसॉर्डर एक गंभीर रोग है। इसके प्रति लापरवाही बरतने का अंजाम बहुत भारी पड़ सकता है। यह बात बहुत-से लोग आज भी नहीं जानते। कैसे पाएं इस गंभीर समस्या से छुटकारा? अनुभवी विशेषज्ञों से राय-मशविरा लेकर बता रही हैं मीनाक्षी

आज पूरी नींद लेने का ऐसा संकट आन पड़ा है कि आदमी को जागे-जागे नींद के सपने आने लगे हैं। जी हां, नींद के सपने? है न थोड़ी अजीब बात पर यह है सच। ऐसी जीवनशैली हो चुकी है कि जागे हैं तो सोये-सोये से और सो रहे हैं तो भागदौड़ की चिंता में जगे-जगे से। किसी के पास भरपूर नींद लेने का वक्त नहीं है और कोई वक्त पर नींद न आने से झुंझलाया हुआ है। कैसे बुलाएं नींद को और कैसे भगाएं नींद को। नींद न आई तो आलस ने आ घेरा, बहुत आ गई तो हो गया काम तमाम।

कहने-सुनने में साधारण-सी बात लगती है कि मेरी नींद पूरी नहीं होती। नींद आती नहीं या फिर मुझे दिन में नींद आती रहती है। यह स्लीपिंग डिसॉर्डर है। इसके प्रति लापरवाही बरतने का इतना भयानक अंजाम भी हो सकता है। यह बात बहुत-से लोग आज भी नहीं जानते।

क्या करें कि नींद भरपूर ली जा सके? क्या करें कि समय पर नींद आ जाए? क्या करें कि हर समय अलसाए हुए से न रहें? क्या करें कि अल्प नींद के कारण अन्य बीमारियों से बचा जा सके? ऐसे कई सवाल हैं जो आम शहरी जीवन में किसी के भी सामने गाहे-बगाहे खड़े हो जाते हैं।

नींद का एक अजीबोगरीब संसार है, एक मनोविज्ञान है, एक वैज्ञानिक पहलू है और एक चिकित्सकीय मनन है। शोध हुए हैं, जानकारियां जुटाई गई हैं। अधिक नींद आना गलत है तो नींद न आना खतरनाक। नींद कितनी लें? नींद न आए तो क्या करें? इसके बारे में समय-समय पर डॉक्टर बताते रहते हैं और संभवत: अमूमन हर आदमी जानता भी है कि क्या करना चाहिए।

स्लीपिंग डिसॉर्डर क्या है?
पिछले कई सालों में स्लीपिंग डिसॉर्डर के हजारों मामले सुलझ चुके हैं। नई दिल्ली के रॉकलैंड हॉस्पिटल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सुदर्शन बताते हैं कि इस समस्या को स्लीपिंग डिसॉर्डर कहते हैं। यह सौ तरीके के हो सकते हैं, जैसे बिस्तर पर जाने के काफी देर बाद नींद आना, दिन में नींद के झटके आते रहना, रात में ज्यादा सपने आना, बार-बार नींद का टूटना, मुंह सूखना, पानी पीने या पेशाब के लिए बार-बार उठना, खर्राटे लेना, रातों में टांगों का छटपटाना, नींद में बोलना, चलना, हरकतें करना आदि।

अक्सर नींद को लोग थकावट या फिर दिमागी तनाव से जोड़ कर सोचते हैं और अच्छी नींद लेने के लिए खुद ही कोई नींद की गोली खा लेते हैं। इस तरह बिना कारण जाने नींद की गोलियां लेने से बीमारी और बढ़ सकती है। हो सकता है कि नींद न आने के सिर्फ ये कारण न हों, कोई अन्य हो।

कई बार कार्य करने के घंटों में फेरबदल होने से भी नींद नहीं आती। जिन लोगों की गर्दन छोटी होती है, जबड़ा छोटा होता है, चेहरा बेहद पतला या चेहरा लंबा होता है, उन लोगों को सोते समय सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। कई बार इनकी सांस गले में अटक जाती है जिसे सामान्य भाषा में खर्राटे लेना कहा जाता है।

कई बार टांगों में नसें फड़कती हैं और उस व्यक्ति की टांगों में छटपटाहट होती है जिस कारण वह अच्छी नींद नहीं ले पाता। इसी तरह कई लोगों को नींद में ज्यादा सपने आने लगते हैं। सपनों का, नींद में बीस प्रतिशत समावेश होना साधारण अवस्था माना जाता है, लेकिन जब सपने इससे ज्यादा आने लगें तो यह स्थिति समस्या बन जाती है। ऐसे लोग मानने लगते हैं कि वे सोए ही नहीं थे।

इसी तरह कई लोगों को नींद में थोड़ा-सा झटका आने पर नींद टूट जाती है। बाद में इनकी हालत यह होती है कि उन्हें कहीं भी जैसे भी पांच मिनट का वक्त मिल जाए तो वे सोने की कोशिश करते हैं। साधारण अवस्था में पेराराइज्ड पोजीशन में होने पर शरीर जागी हुई अवस्था में भी सामान्य हरकतें नहीं कर सकता, लेकिन अगर कोई नींद में चलने लगे या असामान्य हरकतें करने लगे, तब यह समझ लेना चाहिए कि यह स्लीपिंग डिसॉर्डर है। जांच न करवाने पर परिणाम भयानक हो सकता है।

मनोचिकित्सकों के अनुसार नींद न आने या ज्यादा आने के और भी कारण हो सकते हैं। इनकी जांच करवाए बिना कोई दवाई नहीं खानी चाहिए। ऐसी कोई भी असाधारण स्थिति होने पर जांच जरूर करा लें।

सुनने में समस्याएं छोटी-छोटी जरूर लगती हैं, लेकिन इन्हीं असामान्यताओं के कारण ही रात को सोते समय कई बार हार्ट अटैक आ जाता है। अचानक सांस रुक जाती है और नींद में चलते हुए व्यक्ति अपराध तक कर सकता है।

अच्छी नींद के लिए..
नींद न आना विकराल समस्या हो सकती है लेकिन, सौभाग्य से यह लाइलाज ‘बीमारी’ नहीं है। बहुत से ऐसे उपाय हैं जिससे कोई भी व्यक्ति नींद को बुलावा दे सकता है। इनमें जो जरूरी चीजें हैं उनमें शामिल हैं खुद की डाइट जांचना, सोने का माहौल देखना, समय, व्यक्तिगत आदत, जीवनशैली और तात्कालिक एकाग्रता। इन सब बातों में तालमेल बिठाकर बढ़िया नींद ली जा सकती है। कॉफीयुक्त वस्तुओं और एल्कोहल को न कहें।

दोपहर के बाद कॉफी का एकाध प्याला लेना बुरा नहीं, लेकिन सोने से ठीक पहले ऐसा कदापि न करें। धूम्रपान भी अच्छी नींद की राह में रोड़ा अटकाने वाली वस्तु है। सोने से पहले कुछ तरल पदार्थ ले सकते हैं जैसे जूस, दूध आदि। नियमित एक्सरसाइज अच्छी नींद के लिए जरूरी है। अमूमन दोपहर बाद का व्यायाम नींद के हिसाब से अच्छा माना जाता है। सोने से पहले गुनगुने पानी में पैरों को कुछ देर डुबोकर रखना भी अच्छा माना जाता है। बिस्तर आरामदायक होना चाहिए। बिस्तर कैसा हो, इसके कोई तय मानक नहीं हैं, लेकिन तकिया बहुत ऊंचा न हो और गद्दा मुलायम होना चाहिए।

ज्यादा नींद आए तो..
बहुत ज्यादा नींद आने की शिकायत करने वालों के लिए विशेषज्ञ सुझाते हैं कि इस तरह के लोगों को सुबह एक्सरसाइज जरूर करनी चाहिए। दिनचर्या तय करने के अलावा सोते वक्त भारी भोजन नहीं लेना चाहिए। बिस्तर पर जाने से पूर्व पैरों को अच्छी तरह धोना चाहिए। बिस्तर छोड़ने के बाद बैठना हो तो कुर्सी आदि का इस्तेमाल करें। जहां सोए हैं वह जगह तुरंत छोड़ दें। बार-बार सोने की आदत न बनाएं, एक बार पूरी नींद ले लें।
दिन में कदापि न सोएं। सुबह उठने का एक निश्चित समय बना लें। विशेषज्ञ बताते हैं कि हमारी शारीरिक संरचना इस तरह की होती है कि जिस समय उठने की आदत बन जाती है, फिर आदमी लगभग उसी समय पर स्वयं उठ जाता है। सुबह उठने के बाद आलस्य सताए तो मधुर संगीत सुनने से भी इस पर काबू पाया जा सकता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि गरिष्ठ खान-पान दोनों स्थितियों में परेशानी करता है। नींद न आने और ज्यादा आने में भी।

इलाज
जितनी जल्दी हो सके स्लीपिंग डिसॉर्डर का एहसास होते ही अपने डॉक्टर से जांच करवा लेनी चाहिए। इसका चेकअप कराने में रोगी को किसी भी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं होती। ऐसे रोगियों का डायगनोज करने के लिए उन्हें सारी रात एयरकंडीशनर कमरे में सोते हुए अध्ययन किया जाता है। इस कमरे को स्लीप लेब कहते हैं। बिस्तर पर लेटे रोगी के शरीर का संपर्क पूरी तरह कंप्यूटर से जुड़ा होता है।

रोगी की मसल्स का, बंद आंखों का, दिल, सांसों का, टांगों की हर हरकत का और ब्लडप्रेशर आदि का जायजा लिया जाता है। इसके अलावा, खर्राटों के लिए सी.पी.ए.पी.(कंटीन्यूज पॉजीटिव एअरवे प्रेशर) को भी चेक किया जाता है। इस पूरी जांच रिपोर्ट पर ही इलाज निर्भर करता है। यूं तो आम इनसान को यह मानने में काफी वक्त लग जाता है कि वह स्लीपिंग डिसॉर्डर से ग्रस्त है, लेकिन जितना जल्दी हो सके इसे स्वीकार कर चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।

पंद्रह मिनट में छोड़ें बिस्तर
विशेषज्ञ कहते हैं कि कुछ खास परिस्थितियों में बिस्तर को छोड़ देना चाहिए। सबसे पहले यह ध्यान रखें कि बिस्तर का इस्तेमाल सोने के लिए ही करें यानी अखबार पढ़ने, खाना खाने जैसे काम बिस्तर से एकदम अलग करें। विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि पूरी तरह नींद लेने का मूड बन जाए तो ही बिस्तर पर जाएं। बिस्तर पर जाने के 15 मिनट तक नींद न आए तो तुरंत बिस्तर छोड़ दें और खुद को कुछ देर के लिए अन्य कामों में व्यस्त रखें। सोने का स्थान शोरगुल से दूर हो। यदि शोर हो रहा हो तो उस पर ध्यान न दें। तकलीफ हो तो आंखों में लगाए जाने वाली स्लीपिंग बैंड लगाएं। जबरन सोने की कोशिश न करें।

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