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ब्रह्ममुद्रा

यह योग की लुप्त हुई क्रियाओं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्रा है, जिसके बारे में लोग अब कुछ कम ही जानते हैं। इसके अंतर्गत ब्रह्ममुद्रा के तीन मुख और दत्तात्रेय के स्वरूप को स्मरण करते हुए कोई साधक तीन दिशाओं में अपना सिर घुमाता है। इसी कारण इसे ब्रह्ममुद्रा कहा जाता है। यह आम लोगों के लिए जरूरी है और सहज सरल भी। आज जबकि लोग अनिद्रा, तनाव, मानसिक अवसाद जैसे रोगों से ज्यादा घिर रहे हैं यह उनके लिए एक अचूक उपाय है।

ब्रह्ममुद्रा करने की विधि : कमर सीधी रखते हुए पद्मासन में बैठें। अपने हाथों को घुटनों पर और कंधों को ढीला छोड़ें। अब गर्दन को धीरे-धीरे दस बार ऊपर-नीचे करें। यथासंभव सिर को पीछे की तरफ जाने दें। गर्दन को चलाते समय श्वास क्रिया को सामान्य रूप से चलने दें और आंखें खुली रखें। इसी क्रम में गर्दन को झटका दिए बिना दाएं-बाएं भी बारी-बारी से चलाएं। कोशिश करें कि ठोड़ी कंधे की सीध तक चली जाए। दाएं-बाएं 10 बार गर्दन घुमाने के बाद पूरी गोलाई में यथासंभव गोलाकार घुमाएं इस क्रम में कानों को कंधों से छुआएं। इसी का अभ्यास लगातार करने को ब्रह्ममुद्रा योग कहा जाता है।

ब्रह्ममुद्रा के लाभ : ब्रह्ममुद्रा योग करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि जरूरत से ज्यादा नींद आने या नींद न आने की समस्या दूर होती है। ध्यान या साधना और अपने काम में मन लगता है और आलस्य भी नहीं आता। पढ़ने वाले छात्र-छात्रओं के इसे अपनाने पर पढ़ाई की थकान दूर होती है। आंखों की कमजोरी दूर होती है। चक्कर नहीं आते। जिन्हें ज्यादा सपने आते हैं उन्हें इससे विशेष लाभ होता है। इसे अपनाने वाले को बदलते मौसम के सर्दी-जुकाम और खांसी से निजात मिलती है।

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