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ब्रेन स्ट्रोक-2

कल आपने ब्रेन स्ट्रोक संबंधी बुनियादी जानकारी ली। आज आगे। ठीक से सेवा-सुश्रूषा होती रहे तो रोगी न सिर्फ जानलेवा पेचीदगियों से बचा रहता है, बल्कि उसकी हिम्मत और विश्वास भी कायम रहता है। परिवार के लोग यह दायित्व भली-भांति पूरा कर सकते हैं।

शुरुआती समस्याएं 
खांस न पाने और निगलने पर नियंत्रण न रहने से निमोनिया हो सकता है। कूल्हों, कमर, टखनों और ऐड़ियों की त्वचा फटने का जोखिम भी सदा बना रहता है। लकवाग्रस्त टांग में खून के कतरे बनने और उनके फेफड़ों की धमनियों में जाकर फंसने का खतरा होता है। कुछेक रोगियों को पहले कुछ दिनों में मिरगी जैसा दौरा भी पड़ सकता है। मानसिक समस्याएं जैसे अवसाद, चिंता, क्रोध और चिड़चिड़ापन भी अक्सर रोगी को घेरे रहते हैं। इससे याद्दाश्त पर भी बुरा असर पड़ता है।

सुधार की रफ्तार
पहले 15 दिनों में जितना सुधार आए, उतना अच्छा है। इसके बाद भी अगले 5-6 महीनों तक सुधार होता है, पर पहले 3 महीनों के बाद उसकी गति मंद पड़ जाती है। छह महीने के बाद जो कमियां टूट जाती हैं, उनका लेखा-जोखा इस प्रकार है: बोलने की ताकत न लौटना:10 प्रतिशत, मूत्र-त्याग पर नियंत्रण न रहना:10 प्रतिशत, बिना सहारे के चल न पाना:15 प्रतिशत, खाने-पीने में सहारे की जरूरत:20 प्रतिशत, उठकर कुर्सी पर बैठने के लिए सहारे की जरूरत:20 प्रतिशत, सीढ़ियां चढ़ने और कपड़े बदलने में किसी की मदद की जरूरत:30 प्रतिशत। इसके बावजूद, कोशिश करने से, फिजियोथैरेपी से, सहारा लेकर काम करने, हिम्मत बढ़ाने और परिजनों के प्यार से दो वर्ष तक कुछ सुधार देखा जा सकता है। परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने और खुश रहने में ही जीवन का सुख छुपा है।

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  • Web Title:ब्रेन स्ट्रोक-2