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जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पर विचार करेगी सरकार

जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पर विचार करेगी सरकार

विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने बुधवार को कहा कि सरकार ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के तरीके पर नए सिरे से विचार कर सकती है और न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों से निपटने के लिए एक व्यापक विधेयक पेश करने की उसकी मंशा है।

मोइली ने कहा कि उनकी सरकार यह देखना नहीं चाहेगी कि कोई दागी व्यक्ति न्यायाधीश बने। साथ ही उन्होंने कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर पदोन्नत किए जाने की चर्चा में पड़ने से इनकार कर दिया। दिनाकरन को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनाए जाने की प्रक्रिया अभी रोक दी गई है।
   
उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पहले से ही एक प्रक्रिया है जिसके अनुसार हम आज तक चल रहे हैं। मैं यह नहीं दोहरा रहा हूं कि वही प्रक्रिया जारी रहेगी। हो सकता है हम प्रक्रिया में संशोधन करें। जो कुछ भी हम करेंगे, हमें न्यायापालिका को पूरे विश्वास में लेने की आवश्यकता है। वह उस सवाल का जवाब दे रहे थे जिसमें पूछा गया था कि क्या सरकार इस तरह की नियुक्तियों की प्रक्रिया में बदलाव पर विचार कर रही है।
   
मोइली ने सुप्रीम कोर्ट के 1993 और 1998 के फैसलों का उल्लेख किया जिसके जरिए ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित की गई। राजनैतिक दलों की ओर से मांग की जा रही है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार फिर से सरकार को मिलना चाहिए।

मोइली ने कहा कि बिना जवाबदेही के न्यायपालिका की स्वतंत्रता का कोई मतलब और महत्व नहीं है। उसकी विश्वसनीयता को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को तय मानदंडों का पालन करना होगा और न्यायपालिका और राष्ट्र के प्रति जवाबदेह होना होगा।
   
मोइली ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में न्यायाधीशों के आचरण के संबंध में एक प्रक्रिया संहिता निर्धारित की थी लेकिन इसे लागू करने के लिए कोई विधान नहीं था। अपने आस-पास की घटनाओं के मददेनजर हमें देश में न्यायपालिका की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा स्थापित करने की आवश्यकता है।
   
मंत्री ने संकेत दिया कि ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों से निपटने के लिए सरकार 19 नवंबर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान एक व्यापक विधेयक पेश कर सकती है।
   
उन्होंने कहा कि न्यायाधीश जांच विधेयक, 1968 सिर्फ न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया को लेकर है और उसमें और कुछ नहीं है। न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतें और भ्रष्टाचार की शिकायतें हैं। हम सोच रहे हैं कि इसकी जगह एक व्यापक न्यायाधीश मानक एवं जवाबदेही विधेयक लाया जाना चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि यह संसद के शीतकालीन सत्र में पेश होगा।
   
यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार की 1968 के अधिनियम को अद्यतन करने की योजना है तो उन्होंने कहा कि हमारी योजना इसे रद्द कर एक व्यापक विधेयक पेश करने की है जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष अगले कुछ दिनों में रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग संसद का संप्रभु अधिकार है और नया विधेयक आने के बाद भी यह जारी रहेगा।

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