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चार मूलभूत मुद्दों पर गौर करें: शबाना आजमी

यूपी के बाबत चार मसले मुङो सबसे ज्यादा परेशान करते हैं : शिक्षा, औरतों की सेहत, पीने का साफ पानी और बढ़ती शिशु मृत्युदर। मैं इत्मीनान के साथ तो यह नहीं कह सकती कि अगले दस बरसों में इन तीनों मसलों पर ऐसा कुछ होगा कि इंकलाब आ जाएगा, मगर मेरी ख्वाहिश तो यही है। लखनऊ में हिन्दुस्तान समागम का दावतनामा मुङो भी मिला। चाहती तो मैं भी थी कि मैं इसमें शामिल होऊँ, मगर पहले से तय कुछ कार्यक्रमों के कारण मैं शामिल नहीं हो पा रही हूँ। मगर मैं चाहूंगी कि ऐसे प्लेटफार्म पर इन मुद्दों पर भी शिद्दत के साथ गौर किया जाए। 

पिछले दिनों मैं आजमगढ़ में अपने गाँव मेजवाँ में थी। वहाँ हमने एक स्वास्थ्य मेला और जन सुनवाई का इंतजाम किया था। मुङो हैरत नहीं हुई कि इन दोनों में ही महिला स्वास्थ्य की सबसे बदतर तस्वीर सामने आई। इसी तरह प्राइवेट सेक्टर के एक्टिव रोल के चलते और अन्य सूबों की तरह अपने यूपी में भी अच्छी और ऊँची तालीम हासिल करने के तमाम निजी ठिकाने बने और कामयाबी से चल भी रहे हैं, मगर सरकारी स्तर पर प्राइमरी और बेसिक एजुकेशन की जो हालत अपने प्रदेश में है, वह साफ बयान करती है कि इसमें बड़े बदलाव की ज़रूरत है।

यहाँ आबादी का बड़ा हिस्सा जिसमें दलित, पिछड़े और अन्य गरीब तबके शामिल हैं, अपने बच्चाों को अच्छी तालीम चाहकर भी नहीं दिलवा पा रहे। मिड डे मील-जैसी योजनाओं के चलते मंसूबा बांधा गया था कि ऐसे परिवारों के बच्चे नाश्ते और खाने के बहाने स्कूल आएंगे, मगर इस खुराक पर भी भ्रष्टाचार का डाका पड़ गया है। सरकारी स्कूलों की कहीं बिल्डिंग नहीं है, कहीं है तो खण्डहर, कहीं टीचर नहीं हैं तो कहीं बच्चाे स्कूल नहीं आते।
गर्भ के दौरान महिलाओं की मौत का बढ़ता आँकड़ा सबसे ज्यादा चिंता की बात है। क्या शर्म की बात है कि हम अपना पब्लिक हेल्थ सिस्टम नहीं सुधार सके।

एक हवाई जहाज हादसे का शिकार होता है तो सरकारें हिल जाती हैं, मगर यूपी में गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की मौत की शक्ल में हर साल कई हवाई जहाज हादसे का शिकार हो रहे हैं और हम कुछ कर नहीं पा रहे। सबसे अफसोसनाक यह है कि इनमें से 70 फीसदी को छोटे-छोटे उपायों से बचाया जा सकता है। अगर उन्हें वक्त पर आइरन की गोलियां, सही खुराक और ठीक देखभाल मिल जाए तो उनकी मौत न हो। प्रशिक्षित मिडवाईफ का इंतजाम भी बड़ी जरूरत है।

राष्ट्रीय स्वाथ्य मिशन बहुत कारगर भूमिका निभा सकती है, मगर गाँव के सरपंच की मनमर्जी आड़े आती है। अपने इलाके में मैंने कुछ आशाओं से बात की। वे यही नहीं जानतीं कि दरअसल उनका काम क्या है। आज हमारा पब्लिक हेल्थ सिस्टम 20 फीसदी सरकारी है और 80 फीसदी प्राइवेट हाथों में चला गया है। मगर अमेरिका-जैसे मुल्कों में आज भी पब्लिक हेल्थ सिस्टम के 80 फीसदी हिस्से की जिम्मेदारी सरकार की है।

हमारे मुल्क में तो गरीबों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस तक नहीं हो सका। यही नहीं, इतने बड़े और हर लिहाज से बहुत ही अहम सूबे- यूपी में सरकारें पीने का साफ पानी नहीं मुहैया करवा सकी हैं। पैदा होने के एक महीने के भीतर होने वाली शिशु मृत्यु दर काबू नहीं की जा सकी है। डायरिया, पीलिया से नवजात की मृत्यु हो जाती है।

इन सारे मसलों के लिए मैं अकेले सरकारों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराती, मगर हमारे-आपके वोट से चुनकर आने वाली सरकारें कम-से-कम इतना तो करें कि चुनाव के वक्त घोषणा पत्र, भाषणों में जो वादे होते हैं, उनपर कुछ तो अमल करें।

हमारे टैक्स से जो खजाना भरता है, हमारे भले के लिए खर्च करने की जिम्मेदारी सरकार की है, मगर क्या ऐसा वाकई होता भी है? प्राइवेट सेक्टर के साथ पीपीपी का फामरूला अपनाया जा रहा है। मेरे लिहाज से यह बुरा नहीं है मगर क्या इससे हमारे ये अहम मसले वाकई सुलझ सकते हैं? अगर हाँ, तो फिर आखिर वह सुबह कब आएगी?

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