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दो टूक (21 अक्तूबर, 2009)

सुबह-सुबह उठिए, जब कंक्रीट के जंगलों के बावजूद हरसिंगार के सफेद-नारंगी फूल झर रहे होते हैं या फिर रात को गौर कीजिए, किसी मखमली लॉन की दूब पर ओस की चादर बिछ रही होती है, तब अजब मोहक गंध से हमारी मुलाकात होती है। यही शरद है जो त्योहारों के हो-हंगामे के बाद वातावरण में और भी तारी हो गया है।

दिन की धूप के दाँत अब भी थोड़ा पैने हैं मगर उसके रंग और शेड्स पर गौर कीजिए। तीखी-चटक धूप कैसे अपना चोला बदल कर गुनगुना बाना पहन रही है! कुछ दिनों बाद ही वह प्यारी लगने लगेगी। सुबह और शाम के रंग इतने दोस्ताना और खुशनुमा साल के और किन्हीं दिनों नहीं होते। मगर इनसे मिलने और इस आनन्द को महसूस करने का समय है हमारे पास?

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  • Web Title:दो टूक (21 अक्तूबर, 2009)