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पुलिसवाले ही क्यों बनते हैं शिकार

यह एक सीपीआई (एमएल) के पूर्व कार्यकर्ता के साथ घटी सच्ची घटना है। वह जब छात्र था, तब उसके छोटे भाई ने आत्महत्या कर ली। पुलिस ने पहला काम यह किया कि परिवार वालों को धमकाया कि वे पैसे लेकर आएं वरना उन पर हत्या का आरोप लगाकर उन्हें जेल में बंद कर दिया जाएगा। शोक में डूबे परिवारजनों के सामने यह एक काम आ पड़ा कि पहले वे रिश्वत की रकम जुटाएं फिर अपने बच्चे का अंतिम संस्कार करें।

बड़ा भाई जब एमएल का पूर्णकालिक कार्यकर्ता हो गया तब उसका कहना था कि जब भी पुलिसवालों से कहीं आमना-सामना होता तो वह पुलिसवालों की बुरी तरह पिटाई करता। भारत के लगभग हर व्यक्ति के पास पुलिस की संवेदनहीनता और क्रूरता की एकाध आपबीती सुनाने को जरूर होगी। आदमी जितना गरीब और साधनहीन होगा, उसकी ऐसी कहानियां संख्या में ज्यादा और ज्यादा भयानक होंगी।

अभी यह सब याद करने का प्रसंग यह है कि पिछले वर्षों में भारत में नक्सली हिंसा से सात सौ से ज्यादा पुलिसकर्मी मारे जा चुके हैं। ये हमारे आप जैसे ही सामान्य परिवारों के लोग थे, जो हमारी आपकी तरह ही अपना घर-परिवार चलाने की नौकरी कर रहे थे, सिर्फ उनकी नौकरी पुलिस विभाग में थी। यह भी ध्यान देने की बात है कि इनमें से ज्यादातर नक्सलियों के खिलाफ किसी कार्रवाई के दौरान नहीं मारे गए थे, उन्हें नक्सलियों ने अपने जाल में फंसा कर मारा था या उन पर घात लगाकर हमला किया था। यानी उन्होंने नक्सलियों पर हमला नहीं किया, हमलावर नक्सली थे। आखिरकार पुलिसवाले क्यों नक्सलियों के हमलों का शिकार होते हैं।

एक वजह तो यह है कि इससे प्रचार मिलता है। एकाध पूर्व नक्सली नेता का मानना है कि चूंकि मौजूदा नक्सलियों का जनाधार ज्यादा बड़ा नहीं है, इसलिए ऐसी हिंसा से वे जितने मजबूत हैं, उससे ज्यादा मजबूत नज़र आते हैं। लेकिन ज्यादा बड़ी वजह यह है कि भारतीय समाज में पुलिस की छवि बहुत अच्छी नहीं है, पुलिस वालों को हिंसा का शिकार बना कर वे ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में अपनी लोकप्रियता बढ़ाना चाहते हैं। यह सही है कि पुलिस समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखने का सबसे जरूरी औजार है, लेकिन यह भी सही है कि भारतीय समाज में, खासकर कमजोर तबकों में पुलिस को दमनकारी ही माना जाता है।

नक्सलवादी घात लगाकर पुलिसवालों को मारकर अपने को दमन और शोषण के खिलाफ दिखाते हैं और ग्रामीणों, आदिवासियों के सामने यह भी सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि वे पुलिस से ज्यादा ताकतवर हैं, वे पुलिसवालों को मार सकते हैं नक्सलवादियों का जनाधार कितना मजबूत है, उनका संगठन कितना व्यापक और गहरा है, ये सवाल छोड़ दिए जाएं तो भी यह सवाल किसी से पूछा जाना चाहिए कि मान लें अगर वह देश के अत्यंत पिछड़े इलाकों में रह रहा दलित या आदिवासी है और उसे पुलिस और नक्सलियों में से किसी एक को चुनना है तो वह किसे चुनेगा?

खाकी वर्दी पहनकर डंडा फटकारते आने वाले दरोगा और उसी की तरह के कपड़े पहने, उसी की बोली बोलने वाले नक्सली में से कौन उसे कम भयप्रद लगता है? यह सच है कि जहां-जहां नक्सल प्रभाव है वहां-वहां विकास कार्य नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन जब वहां नक्सलवाद नहीं पनप रहा था, तब कौन से विकास कार्य हो रहे थे, जिनके न होने पर वह विलाप करे। छत्तीसगढ़ या ओडीशा या झारखंड के गरीब आदिवासी की आर्थिक स्थिति तब भी वैसी थी और अब भी वैसी ही है, फर्क सिर्फ यह है नक्सलियों के डर से पुलिस या नायब तहसीलदार उसके गांव में नहीं आते।

मुद्दा यह नहीं है कि एक लगभग अप्रासंगिक हो चुकी विचारधारा को मान रहे नक्सलियों से लड़ा जाए या नहीं, बात यह है कि हम नक्सलियों को खत्म करके नक्सल प्रभावित जनता को क्या देना चाहते हैं। पुलिस और प्रशासन के तौर-तरीकों में व्यापक सुधार के बिना नक्सलियों से लड़ना मुश्किल है और अगर सुरक्षा बलों के सहारे उन्हें खत्म कर भी दिया गया तो प्रतिरोध के दूसरे हिंसक रास्ते पैदा हो जाएंगे। जब तक पुलिस का हिंसक, दमनकारी रूप और प्रशासन का जनविरोधी रवैया नहीं बदलता, नक्सलवाद से लड़ने का कोई नैतिक आधार नहीं बचता।

विरोधाभास यह है कि नक्सलवादी दमन के प्रतीक पुलिसवालों को मारते हैं तो वे दरअसल अपने ही वर्ग के लोगों को मार रहे होते हैं। जो शोषक ठेकेदार या सरकारी अफसर होते हैं, उनसे वे चौथ वसूल कर उन्हें सुरक्षित कर देते हैं। पुलिस में सुधार इसलिए भी जरूरी है ताकि ये निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी एक ऐसे आंदोलन की भेंट नहीं चढ़े, जिसके विचार या व्यवहार को वे जानते भी नहीं। सामान्य भारतीय मन में पुलिस के प्रति जो घृणा है वह आदिवासी इलाकों में नक्सलवादियों के हाथ पुलिस के कत्लेआम के रूप में दिखाई देती है और शहरों में कानूनों के उल्लंघन के रूप में। अक्सर आम भारतीय छोटे-मोटे कानूनों का उल्लंघन इसलिए भी करता है, क्योंकि उन्हें वह सिर्फ पुलिस से जोड़कर देखता है।

पुलिस और प्रशासनिक सुधारों की जरूरत इसलिए भी है कि उससे पुलिस या सरकारी कर्मचारी की छवि जनविरोधी हो गई है। अपराधी छवि वाले राजनेताओं की लोकप्रियता का बड़ा कारण यह है कि भले ही वे अपराध करते हों लेकिन वे अपने इलाके में पुलिस और प्रशासन से समांतर एक तंत्र बना देते हैं जो थाने-कचहरी में उनकी मदद करता है। अगर ‘नक्सल कॉरिडोर’ में नक्सलियों का राज है तो देश के कई दूसरे इलाकों में दबंग राजनेताओं और अपराधियों की चलती है। यह सरकारी तंत्र के कमजोर होने से  नहीं, उसके जनता के प्रति मित्रवत न होने की वजह से होता है। दिक्कत यह है कि कोई राजनैतिक दल पुलिस में सुधार नहीं चाहता।

जब भाकपा के वरिष्ठ नेता इंद्रजीत गुप्त गृहमंत्री थे तो उन्होंने पुलिस सुधार आयोग की रपट लागू करने के लिए तमाम राज्यों को लिखा था। तब पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने अपने ही इतने बड़े नेता की चिट्ठी का जवाब तक देना मुनासिब नहीं समझा था। आज पश्चिम बंगाल की हालत यह है कि नक्सलियों के डर से पुलिसवाले थाने में ताला लगा कर भाग जाते हैं और चालीस साल से राज कर रही माकपा के कार्यकर्ता कई इलाकों में घुसने की हिम्मत नहीं करते। पुलिस का और प्रशासन का इकबाल बना रहे यह देश में सुव्यवस्था के लिए जरूरी है, लेकिन उसके लिए पुलिस और प्रशासनिक सुधार सबसे पहले जरूरी है।

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में एसोशिएट एडीटर हैं

rajendra.dhodapkar @hindustantimes. com

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