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ब्लॉग वार्ता : पिंजर प्रेम प्रकासिया

मीडिया से गायब कर दिए गए जगत-प्रेमी युगल मटुक-जूली अब ब्लॉग जगत की शोभा बढ़ाने आ गए हैं। प्रेम के प्रति इस हिंसक समाज में अपना मजाक उड़ा कर या मजाक बन कर इन दोनों ने जो प्रेम को समझाने की कोशिश की, इतिहास इनके साथ न्याय करेगा। लेकिन न्यूज चैनलों ने इनके साथ खूब न्याय किया और गायब कर दिया। हिंदी न्यूज चैनल घंटों इनके बिस्तर से लेकर बातों तक में घुसे रहते थे। इसी दौरान उत्तर प्रदेश के एक पुलिस अफसर पांडा साहब ने भी मीरा का रूप धरकर प्रेम का विहंगम दृश्य रच दिया।

प्रोफेसर मटुकनाथ और प्रेमिका जूली। थोड़ा सा ही याद कीजिए तो किस्सा पूरा याद आ जाएगा। बस क्लिक कीजिए तो दोनों की मुस्कुराती तस्वीर आपको http:// matukjuli. blogspot. com पर मिल जाएगी। मुझे तो दोनों प्रेम के लाइव कथाकार लगते हैं। आंसू कविता की तरह धांसू प्रवचन देते हैं। ब्लॉग पर प्रेम की महिमा समझा रहे हैं।

लिखते हैं कि प्रेम का दिव्य रूप तो हमें स्वीकार्य है, किन्तु उसके मानवीय रूप को लेकर असमंजस है। हम कहते हैं ईश्वर से प्रेम करो, लेकिन ईश्वर को कहां खोजेंगे? हम कहते हैं देश से प्रेम करो, लेकिन देश हमें कहां मिलेगा? जो भी मिलेंगी वे स्त्री-पुरुष होंगे। जो प्रेम का चरम रूप है, वहीं से हम आरंभ करना चाहते हैं। जिस मिट्टी में प्रेम जन्म लेता है, उसे हमने अस्वीकार कर दिया। प्रेम की जन्मभूमि देह के प्रति हमने घृणा पैदा कर दी। शारीरिक प्रेम कहकर हमने उसकी उपेक्षा की। नतीजा हुआ व्यक्तित्व का विघटन।

अच्छा हुआ मटुक-जूली ब्लॉगर बन गए। अपनी बात को विस्तार से कहने का मंच मिल गया। मटुक जी पूरे विस्तार से लिख रहे हैं कि कैसे पटना के बिहार नेशनल कॉलेज में जूली से प्यार हो गया। वो सब जो आप जानना चाहते हैं कि पहली बार कब मिलें, किसने किसको क्या कहा आदि आदि। मटुक-जूली एक-एक अंतरंग सवालों का बहिरंग जवाब दे रहे हैं।

एक सवाल के जवाब में मटुकनाथ लिखते हैं कि जब हम सड़कों पर निकलते हैं तो लोग कुतूहल से देखते-दिखाते हैं। कानाफूसी करते हैं, मुस्कुराते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। अच्छे भाव वाले लोग प्रेम से मिलते हैं। सहानुभूति जताते हैं। कुछ लोलुप लोग जूली को देख कर लार टपकाते हैं।

मटुकनाथ की यही बात मुझे अच्छी लगती हैं। समाज की उठती-गिरती अच्छी बुरी नज़रों का राज खोल देते हैं। सारे सवालों का हिम्मत से सामना करते हैं और संयम से जवाब देते हैं। किसी भागे हुए प्रेमी की तरह नहीं, बल्कि लौट कर आए प्रेमी की तरह। अब घर आ गए हैं तो मुकाबला करना ही होगा। क्या-क्या सितम न सहे इन दोनों ने। दुनिया में कितने लोगों ने अपने पति और पत्नी को छोड़ कर दूसरे को अपना समझा। इनका प्रेम समझा ही नहीं गया और न समझा जाएगा।

युवाओं के लिए संदेश भी है इस ब्लॉग पर। कहते हैं, दूसरे के जीवन में दिलचस्पी लेने से अपने जीवन को गहराई से देखना पड़ता है। जो अपने जीवन की गहराई में जितना प्रवेश करेंगे, वे उतना ही उसे देख पाने में सक्षम होंगे। देखने मात्र से समस्या हल होती है, अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता है।

इसके अलावा मटुक साहब बीमार नैतिकता पर भी लंबा लिख रहे हैं। गुरु-शिष्या परंपरा पर भी विस्तार से बता रहे हैं। एक प्रेम के बदले सफाई का पोथा लिखे जा रहे हैं। लिखते हैं कि प्रश्न है, गुरु-शिष्या के बीच प्रेम संबंध होना चाहिए या नहीं? लेकिन इसके पहले यह प्रश्न है कि इसका निर्धारण कौन करता है और उस निर्धारण के पीछे उसकी धारणा क्या है? कोई तो भिड़ा हुआ है समाज की सोच से टकराने के लिए।

ब्लॉग पढ़ते हुए मटुक जी मुझे आज कल के लाइव-टेलिकास्ट वाले बाबा की तरह लगने लगते हैं। पटना विश्वविद्यालय में बम फेंके जाने की अफवाह पर उनकी प्रतिक्रिया इस प्रकार है। बम दो प्रकार का होता है। एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म। स्थूल बम वह है जो कल देकर गया था। सूक्ष्म बम वह है जिसके द्वारा किया गया संहार सबकी समझ में नहीं आता है। पहला बम शरीर को आघात पहुंचाता है, दूसरा विचार को। विश्वविद्यालय स्वयं एक विचार विनाशक सूक्ष्म बम है। जो विचार पैदा करने और निखारने की जगह होनी चाहिए थी।

बहुत ही सीरियस किस्म का हास्य है। मटुकनाथ से बहस करने का मन हो तो सलाह यही है कि पूरी तैयारी कर लें। उनके ब्लॉग को पढ़कर आनंद भी आएगा और गंभीर होकर चिंतन करने का पूरा मौका भी मिलेगा।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है naisadak .blogspot. com

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