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मंदिर जाने के पहले

अमृता प्रीतम ने एक बार कहा था ‘हिंदुस्तान की सोच अद्भुत है। यहां किसी भी बच्चे के सिर पर मोरपंख लगा दो, वह कृष्ण बन जाता है।’ कृष्ण का बाल रूप हमारे लोकमानस में ऐसा समाया है कि हर मां यशोदा नज़र आती है, और हर बच्चा कृष्ण। बच्चे का लालन-पालन मां को अनायास भक्ति की चरम सीमा पर पहुंचा देता है। मां शिशु को जन्म देकर ब्रह्मा के सृजनकार्य में हाथ बंटाती है। उसको स्नान करा कर शिव का अभिषेक करती है। दूध-दही खिलाकर पालनहार विष्णु के कर्म में भागीदार बनती है।

यही शिशु प्रेम यदि अपने बच्चों से होता हुआ, साधनहीन बच्चों तक भी पहुंच जाए तो भक्ति और निखर उठती है। बालक के स्वभाव को अपनाकर निश्छल मन से, भेदभाव से परे होकर, सहज भाव में जीना आदर्श भक्त का लक्षण माना गया है। बच्चे में वैर की भावना टिक नहीं पाती। एक पल गुस्सा दूसरे पल निर्मल मुस्कान। इसी भोली पवित्र मानसिकता में भक्ति को पनपने का अवसर मिलता है।

विधिवत पूजा-अर्चना मन को केन्द्रित करने में सहायक होती है, पर यदि प्रतिदिन के जीवन में किसी जरूरतमंद की उपेक्षा कर दी तो पूजा के विराट आयोजन निष्फल हो जाते हैं। मनुष्य मात्र में विद्यमान ईश्वर की आराधना सच्ची साधना है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था ‘मनुष्य ही परमात्मा का साक्षात मंदिर है, इसलिए साकार देवता की पूजा करो।’ महर्षि दयानन्द सरस्वती, ‘पूजा’ को सत्कार मानते हैं। सत्कार, चेतन पदार्थ का ही सम्भव है।

पूजा के वास्तविक फूल हैं श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, दया, मैत्री, समता और क्षमा। अपने मन से पाप के अंधेरे को न मिटाया तो दीप जलाना व्यर्थ हो जाता है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सच्ची आराधना की व्याख्या इस प्रकार की है: मंदिर में प्रभु के चरणों पर फूल चढ़ाने से पहले अपने घर में प्यार की महक भरो। मंदिर की दहलीज पर दीया जलाने से पहले भीतर समाए पाप के अंधेरे को दूर करो।

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