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वीसा में भेदभाव

पूर्व केन्द्रीय मंत्री और सांसद शाहनवाज हुसैन को आखिरकार प्रधानमंत्री के कहने पर अमेरिका का वीसा मिल गया, लेकिन इस प्रसंग ने कुछ कड़वाहट तो छोड़ ही दी है। शाहनवाज एक संसदीय प्रतिनिधि मंडल के सदस्य के तौर पर अमेरिका जा रहे थे और वे अपनी टीम के एक दिन बाद अमेरिका जा पाए। ऐसा नहीं था कि अमेरिकियों को यह मालूम नहीं था कि वे सांसद हैं और भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर अमेरिका जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सामान्य रूप से वीसा नहीं दिया गया।

इसका अर्थ यह है कि यह जानते हुए कि इस बात पर विवाद होगा, उन्हें रोका गया। शायद बीच-बीच में विशिष्ट हैसियत वाले मुस्लिमों को रोक कर अमेरिकी सरकार यह जाताना चाहती है कि वह मुस्लिमों के अमेरिका प्रवेश को लेकर विशेष रूप से सचेत है, वरना शाहनवाज हुसैन को रोकन का कोई औचित्य नहीं है। अमेरिका की इसके पीछे कुछ भी रणनीति हो, लेकिन इससे दुनिया में फैले उन दुराग्रहों को कम करने में कोई मदद नहीं मिलती, जिनकी वजह से आज की समस्याएं पैदा हुईं और पनपी हैं।

दूसरे, इसके जरिए भले ही अमेरिका अपनी सुरक्षा को ज्यादा पुख्ता मान रहा हो, लेकिन यह दूसरे देशों के नागरिकों का, उन देशों के स्वाभिमान और किसी समुदाय विशेष का अपमान है। अगर कोई व्यक्ति भारत का जनप्रतिनिधि है और किसी आधिकारिक हैसियत से अमेरिका जा रहा है तो उसकी सामान्य सुरक्षा जांच तो जायज है, लेकिन उस पर विशेष रूप से आक्षेप करना हमारे लिए आपत्तिजनक होना चाहिए। लेकिन आपत्तिजनक उनके साथी सांसदों का आचरण भी है, जो बिना विरोध दर्ज किए शाहनवाज हुसैन को छोड़कर अमेरिका चले गए।

वे भारत की संसद के प्रतिनिधि के तौर पर अमेरिका जा रहे थे और ऐसे में उन्हें अपनी गरिमा को संसद की गरिमा से जोड़ना था। जब भारत में सांसदों को जायज रूप से भी सुरक्षा वजहों से रोका जाता है तो वे बवाल खड़ा कर देते हैं। लेकिन जब अमेरिकी सरकार का एक विभाग ऐसा कुछ करता है तो वे चुपचाप सह लेते हैं। लेकिन जब हमारे यहां अपने ही कश्मीरी नौजवानों के साथ ऐसा ही व्यवहार होता है तो भी कश्मीर के बाहर कोई विरोध नहीं होता। अपने नागरिकों की गरिमा का सम्मान अगर हम नहीं करेंगे तो दूसरों से क्या उम्मीद करें।

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