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हाइड्रोग्राफिक सर्वे

समुद्र में रोज तरह-तरह के परिवर्तन होते हैं। इनकी जानकारी पाने और इसके अंदर के विराट रहस्यों को समझने के लिए ही हाइड्रोग्राफिक सर्वे किया जाता है। साथ ही इसकी मदद से समुद्र में मौजूद खनिजों, धातुओं, गैस आदि के भंडार पता लगाने में मदद मिलती है। इसके अलावा समुद्र के भीतर केबल, पाइपलाइन बिछाने, ड्रेजिंग जैसे कार्यो के लिए उसमें लगातार होने वाले परिवर्तनों के बारे में जानकारी करना बेहद जरूरी है।

भारत में पहली बार नेवल हाइड्रोग्राफिक डिपार्टमेंट, जो मेरीन सर्वे ऑफ इंडिया के नियंत्रण में था, की स्थापना 1770 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी। 1874 में कैप्टन डुंडस टेलर ने मेरीन सर्वे ऑफ इंडिया को कोलकाता में स्थापित किया। 1947 में इस डिपार्टमेंट को मेरीन सर्वे ऑफ इंडिया के सुपुर्द कर दिया गया। इसके बाद इसे 1954 में देहरादून में स्थापित किया गया और इसका नाम नेवल हाइड्रोग्राफिक ऑफिस कर दिया गया। बाद में 1996 में इसका नाम नेशनल हाइड्रोग्राफिक ऑफिस कर दिया गया। नेशनल हाइड्रोग्राफिक सर्वे मार्च 1999 में आईएसओ 9002 का स्तर प्रदान किया गया।

हाइड्रोग्राफिक सर्वे समुद्र का वैज्ञानिक मानचित्र होता है, इसमें समुद्र की गहराई, उसकी आकृति, उसका तल, उसमें किस दिशा से और कितनी धाराएं बहती हैं, पता लगाते हैं। साथ ही उसमें कब और कितना ज्वार आता है। ङीलों और नदियों का भी हाइड्रोग्राफिक सर्वे किया जाता है, केवल उस स्थिति में जब उनमें जहाज चलते हों। इससे इंजीनियरिंग और नेविगेशन के काम में सहायता मिलती है। हाइड्रोग्राफिक सर्वे में पानी की वर्तमान मात्र और रिजर्वायर के प्रोफाइल के बारे में जानकारी मिलती है।

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