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सरपट दौड़ती ट्रेन पैदा कर सकती है बिजली

सरपट दौड़ती ट्रेन पैदा कर सकती है बिजली

एक इंजीनियरिंग टूल विशेषज्ञ ने चलती ट्रेन से पटरियों के समीप पैदा होने वाले वायु दाब का इस्तेमाल करते हुए बिजली पैदा करने की एक पर्यावरण अनुकूल तकनीक विकसित करने का दावा किया है।

कई इंजीनियरिंग और मैकेनीकल यूनिटें चलाने वाले 38 वर्षीय संतोष प्रधान ने यह तकनीक विकसित की है और इस संबंध में सरकार के साथ 20 पेटेंट पंजीकृत कराए हैं। प्रधान को इंजीनियरिंग कल-पुर्जों के निर्माण में दो दशक से अधिक का अनुभव है। प्रधान ने बताया कि जब एक ट्रेन 110-120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पूरी स्पीड से दौड़ती है तो यह विपरीत दिशा में वायु दाब पैदा करती है और आज तक किसी ने इस विशाल वायु दाब का इस्तेमाल करने के बारे में नहीं सोचा, जो मुफ्त में और आसानी से उपलब्ध है।

अपनी तकनीक की व्याख्या करते हुए प्रधान ने बताया कि इसमें रेलवे लोकोमोटिव के अगले हिस्से में एक छोटा इम्पेलर लगा दिया जाता है। और इसी प्रकार एक ट्रेन के हर डिब्बे के उपर ऐसी ही व्यवस्था कर दी जाती है। उन्होंने बताया कि जब एक ट्रेन दौड़ती है, तो हवा की तेज गति से बडी़ मात्रा वायु दाब पैदा होता है। पटरी के दोनों ओर बनाए गए बडे टैंकों में इस वायु दाब को एकत्र कर हम टर्बाइन चला सकते हैं जो अच्छी खासी मात्रा में बिजली का उत्पादन कर सकते हैं।

प्रधान ने अब इस तकनीक के प्रदर्शन तथा प्रोटोटाइप की अनुमति के लिए रेलवे से संपर्क किया है। उनका दावा है कि यह तकनीक पर्यावरण अनुकूल और लागत अनुकूल भी है। उन्होंने कहा कि देश में 63,028 किलोमीटर लंबे रेल मार्ग पर करीब 14,300 गाडि़यां दौड़ती हैं और इस प्रकार इस तकनीक से प्रति किलोमीटर 20-89 मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है। इस प्रकार पूरे रेल मार्ग से करीब 14,81,134 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सकता है।

प्रधान ने कहा कि भारतीय रेलवे ईंधन के मद में अपने राजस्व का 17 प्रतिशत खर्च करता है जो सालाना 15000 करोड़ रुपये की रकम बैठती है। यदि इस तकनीक को चरणबद्ध तरीके से भी अपनाया जाए तो इससे ईंधन की लागत में काफी कमी की जा सकती है।

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