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एकल होने के दुख

एकल होने के दुख

‘अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो’ की गुहार महिलाओं की दुखभरी दास्तान बयान करने के लिए काफी है। इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर खड़े देश की ज्यादातर महिलाओं के मुंह से आज भी शायद यही बोल फूटेंगे। हमारे समाज में महिला होने का मतलब है पूरी जिन्दगी मुसीबतों से जूझना। महिला बहू-बेटी, मां-बहन, अधिकारी-कर्मचारी किसी भी भूमिका में हो, परेशानी उसका पीछा नहीं छोड़ती। पिता-पति के साए में जीने वाली महिलाओं को तो फिर भी सामाजिक सुरक्षा व संरक्षण मिल जाता है, किन्तु जो औरतें अकेली हैं, उनकी कठिनाइयां बयान से परे हैं।  2001 की जनगणना के अनुसार भारत में करीब साढ़े तीन करोड़ विधवा (कुल आबादी का 6.9 प्रतिशत) है, जो दुनिया के अनेक देशों की आबादी से भी अधिक हैं। इसके अलावा तलाकशुदा व परित्यक्ता कुल जनसंख्या का आधा प्रतिशत तथा तीस पार करने के बाद भी अकेली रह रही महिलाओं की संख्या 1.4 प्रतिशत है।

इन आंकड़ों से यह तो समझ जा सकता है कि देश में करोड़ों औरतें अकेले जी रही हैं, किन्तु उनकी मुसीबतों का अंदाज अकेले आंकड़ों के आईने से लगाना असंभव है। एकल महिला अमीर हो या गरीब, मुसीबत मरते दम तक उसका पीछा नहीं छोड़ती। विधवा होना तो हमारे समाज में अभिशाप है ही, किन्तु पति या ससुराल के अत्याचारों से तंग आकर अलग रह रही स्त्री को भी सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। घर चाहे पति का हो या पिता का, अकेली औरत को आसरा देने का इच्छुक कोई नहीं होता। सामाजिक और धार्मिक बंधनों की बेड़ियां डालकर उसे काबू में रखने की कोशिश की जती है। अकेली महिलाओं की संपत्ति, बच्चों और यौन इच्छा को घर-बाहर के पुरुष अपने नियंत्रण में रखने का प्रयास करते हैं। ऐसी महिलाओं को कानून का भी पर्याप्त सहारा नहीं मिल पाता। नतीज यह होता है कि उन्हें ताउम्र किसी न किसी के इशारों पर नाचना पड़ता है।

देश में विधवाओं के मुकाबले विधुर पुरुषों की संख्या केवल एक तिहाई है। आंकड़े गवाह हैं कि केवल नौ प्रतिशत विधवाएं ही दोबारा विवाह कर पाती हैं। इसका कारण अंधी सामाजिक परंपरा है, जो पत्नी की मृत्यु के बाद पुरुष को दूसरे विवाह की अनुमति तो सहज दे देती है, किन्तु विधवा को अकेले जीने को विवश करती है। परिवार की संपत्ति बाहर जने का डर भी विधवा-विवाह के मार्ग में एक बड़ी अड़चन है। अकेली महिला के चरित्र को लेकर तरह-तरह के लांछन लगाना तो आम बात है ही।

एकल महिलाओं के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे राष्ट्रीय फोरम के अध्ययन से कुछ और चौंकाने वाले सच सामने आए हैं। फोरम ने देश के सात राज्यों- केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में व्यापक सव्रेक्षण में यह पाया कि दक्षिण के मुकाबले उत्तर भारत के राज्यों में एकल महिलाओं की स्थिति ज्यादा खराब है। अक्सर यह माना जता है कि पति की मृत्यु, तलाक या छोड़ दिए जने के बाद स्त्री को उसके पिता या भाई के घर में सहारा मिल जाता है। अध्ययन ने इस मिथ्या धारणा की पोल खोल दी है। अधिकांश अकेली महिलाओं को अपने दम-खम पर जीवन गुजरना पड़ता है।
 
फोरम ने सैनिकों की विधवाओं का अलग से अध्ययन किया, जिसका नतीज खासा दिलचस्प है। कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की बेवाओं को 25-30 लाख रुपए की अच्छी-खासी रकम मिली थी। ऐसी महिलाओं को साथ रखने के लिए पीहर और ससुराल वालों में खींचातानी देखने को मिली है। इन महिलाओं की गांठ में पैसा है, इसलिए घर-समाज में उनकी इज्जत है।
 
अच्छी बात यह है कि सदियों से प्रताड़ित और शोषण की शिकार एकल महिलाएं अपनी चुप्पी तोड़ रही हैं। सदियों से शोषण, प्रताड़ना, उपेक्षा व क्रूर प्रथाओं से जकड़ी ये औरतें बदलाव के लिए संघर्ष कर रही हैं। मर्दो के साए से निकल कर अपनी अलग पहचान बनाने का प्रयास कर रही हैं।

इसी के परिणामस्वरूप 2000 में राजस्थान में ‘एकल नारी शक्ति संगठन’ की स्थापना हुई। अब राष्ट्रीय एकल नारी अधिकार मंच बनाया गया है। मंच द्वारा सरकार से मांग की ज रही है कि एकल महिला को अलग पारिवारिक इकाई माना जए, ऐसी सभी गरीब महिलाओं को बीपीएल सूची में जोड़ा जए, उनका राशन कार्ड बनाया जाए, कुछ राज्यों में विधवा पेंशन में लागू कोटा व्यवस्था समाप्त की जए, सभी एकल महिलाओं व उनके बच्चों को नि:शुल्क स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराई जए, विकलांग एकल महिला को पेंशन व विशेष स्वास्थ्य सुविधा नि:शुल्क दी जाए, उन्हें पैत्तृक व ससुराल की भूमि एवं संपत्ति में बराबर का अधिकार मुहैया कराया जए, गरीब एकल महिलाओं को 100 रुपए प्रति माह सामाजिक सुरक्षा पेंशन तथा आवासहीन एवं भूमिहीन एकल महिलाओं को आवास और आजीविका के लिए जमीन आवंटित की जाए।

और महिला अधिकारों से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना जिला और मंडल स्तर पर की जए, बजट में एकल महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान हो और 2011 की जनगणना में एकल महिलाओं की विभिन्न श्रेणियों - विधवा, तलाकशुदा, परित्यक्ता, अविवाहित - को बतौर अलग-अलग वर्ग दर्ज किया जाए। आशा है करोड़ों महिलाओं के भविष्य से जुड़े इन सुझावों पर सरकार शीघ्र कदम उठाएगी।

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