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जरूरत है बिचौलियों से बचने की

बिहार को विकसित राज्यों की सूची में देखना एक सुखद अनुभव होगा, लेकिन यहां संपूर्ण विकास की नींव हम तब डाल सकते हैं, जब जागरूक और समर्पित सरकार होगी। यहां की सरकार और जनता क ो इस सपने को साकार करने के लिए हर तरह की चुनौतियों से निपटने के लिए संकल्प लेना होगा और लक्ष्य प्राप्ति तक अपने संकल्प पर कायम रहना होगा। राज्य के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं, जैसे- गरीबी, जातिवाद, संसाधनों की गैरबराबरी, निरक्षरता, बाढ़-सुखाड़ जैसी आपदाएं, कर्मठ और समर्पित सरकार का अभाव, आपराधिक तत्वों का वर्चस्व और रूढ़िवादी सोच इत्यादि।

बिहार में इतनी गरीबी और असमानताएं हैं कि यह बताना मुश्किल है कि विकास का काम कहां से शुरू करें। जो परिवार गरीबी में फंस गए हैं, उनकी स्थिति सुधरती नहीं है। उनका प्रयास सिर्फ इतना रहता है कि वो किसी प्रकार अपने परिवार को जिन्दा रखें। अतिरिक्त जिम्मेदारियों जैसे बच्चों की पढ़ाई, उचित इलाज और रहने के लिए आरामदायक घर आदि इनके वश के बाहर है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बहुत ही कम संसाधनों के बीच ये जिंदगी बिताते हैं। सरकार जो विकास योजनाएं अपनी जनता के लिए समय-समय पर शुरू करती है, लोगों को इनकी जानकारी नहीं है और ये इतने जागरूक और मजबूत नहीं कि अपने अधिकार लड़कर ले लें। अपना अधिकार पाने के लिए ये बिचौलियों की मदद लेते हैं और इस प्रक्रिया का परिणाम यह होता है, बिचौलिये बार-बार लाभान्वित होते हैं और जनता शोषण का शिकार।

देखा जाए तो यहां योजनाओं की कमी नहीं है लेकिन जरूरतमंदों तक योजनाओं का लाभ आसानी से नहीं पहुं च सकता है। जो परिवार बीपीएल के अन्तर्गत आते हैं, वे भी रंगों के खेल में फंस जाते हैं। पीला, लाल और एक रंग इन दोनों के बीच में। जब पीला कार्ड लेकर अपने राशन के लिए जाते हैं तो मांगते हैं, लालकार्ड। यहां सबके पास कुछ जमीन है, एक सुरक्षित घर है और मूलभूत जरूरतें पूरा करने की क्षमता है, संसाधन है। लेकिन जिनके पास जमीन है, वे सैकड़ों बीघा जमीन के मालिक हैं। उनके बगल में ही सैकड़ों परिवार ऐसे हैं, जिनके पास एक धुर भी जमीन नहीं है। यहां तक कि झाेपड़ी लगाने के लिये वे सड़क के किनारे या नहर के किनारे शरण लेते हैं। सबसे ज्यादा दलित और अत्यंत पिछड़ों की हालत यही है। अत: जमीन जैसे संसाधन सभी को मुहैय्या कराना जरूरी है। शहर के विकास और सौन्दर्यीकरण के नाम पर दलित और गरीबों को अपनी झोपड़ियों से उजाड़कर बेसहारा कर देते हैं और उनके पुनर्वास के लिए कोई व्यवस्था नहीं की जाती है। हम जान सकते हैं कि विकास किसके हक में है?सिर्फ कुछ खास लोगों के लिए है। राज्य के विकास में जातीयता बहुत बड़ी चुनौती है।

कुल आबादी का 20 प्रतिशत के पास जमीन, नौकरी, बिजनेस और सब कुछ है और उनका विकास तेजी से हो रहा है और यह 20 प्रतिशत आबादी ऊंची जातियों की है। यहां भूमिहीन लोगों में 95 प्रतिशत से ज्यादा दलित हैं। ऊंची जाति का वर्चस्व हमेशा विकास और विकास से जुड़े संसाधनों पर रहता है। जिनके पास पूंजी नहीं है, वे विकास की बात नहीं कर सकते हैं। पूंजी बिना कोई काम नहीं हो सकता है, जो उन्हें विकास की ओर ले जाएगा। यहां अशिक्षा तो अभिशाप है। अशिक्षित् जनता अपने अधिकारों के बारे में कुछ जान् नहीं पाती है। राज्य के पंचायतों में कई ऐस योजनाएं हैं, जिनसे लोग आगे बढ़ सकते हैं। जैसे शिक्षा से जुड़ी योजनायें जो बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा के लिये अवसर देते हैं। य फिर बच्चों के लिये ड्रेस, साइकिल इत्यादि भ मिलने का प्रावधान है, जो उनको प्रोत्साहन द सकते हैं। लेकिन यहां की स्थिति ऐसी है कि जो मां-बाप अनपढ़ हैं, उन्हें योजना के बार में जानकारी नहीं है और वे सोचते हैं कि बच्चों को भी शुरू से कमाने के लिये लगाएंग तब कुछ और आमदनी हो जाएगी। इस तरह बच्चों की पढ़ाई-लिखाई बंद हो जाती है और वे विकास की मुख्यधारा से कट जाते हैं।

नरेगा के तहत 100 दिन का काम साल मे सबको मिलना है, लेकिन उसमें एक आवेदन देने की जरूरत है, तब आपको काम मिलेगा। आवेदन नहीं लिख पाने के कारण गरीब इस काम से भी वंचित हो जाते हैं। उनके पास पैसे की कमी है। उनका परिवार भूख, एनीमिया और अन्य बीमारियों का शिकार है। निरक्षरता के साथ-साथ भ्रष्टाचार जनता को विकास की रास्ते से हटा देते हैं। जब तक भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं होगा बिहार मे वकास की रोशनी नहीं चमक सकती। यदि एक गरीब परिवार टोका फंसाकर अपनी झाेपड़ी में बल्व जलाता है तो उन पर कार्रवाई होती है, मुकदमा तक लड़ना पड़ता है, लेकिन कोई उद्योगपति अपनी पूरी फैक्टरी अवैध रूप से बिजली लेकर चलाता है तो उसपर कोई कार्रवाई नहीं होती क्योंकि वह घूस देकर विभाग के अधिकारी को अपने पक्ष में कर लेता है। दलित, महिला और आम पुरुष काम के लिए दौड़ते रहते हैं। सबसे पहले ये लोग एक दो दिन की मजदूरी छोड़कर अपना पंचायत भवन, ब्लॉक या जिले में जाते हैं और जब उनका काम नहीं होता है तो वे मजदूरी करने जाते हैं, यह सोचकर कि कम से कम उनका परिवार भूख से न मरे।

भ्रष्टाचार पर आवाज बहुत ही कम उठ रही है क्योंकि बहुत लोग यह सोचते हैं कि हल्ला करेंगे तो जो कुछ मिल सकता है, वो भी नहीं मिलेगा। अंत में ऊपर से नीचे तक जितना कमीशन लेना है इसके बाद बची हुई राशि जनता लेती है। भ्रष्टाचार के साथ-साथ रंगदारी भी बिहार के विकास में बाधा पहुंचाती है। विकास के लिये रोड बनाना, तालाब, खोदना इत्यादि काम पास होते हैं तो बाहुबली उस पर हक जमाते हैं। उनके द्वारा तय की रकम जब तक नहीं मिलेगी तब तक काम होने नहीं देंगे। धमकी या अपहरण या जान पर खतरे की धमकी देकर वे अपना हिस्सा वसूल करते हैं। इन सारी चुनौतियों के बीच जनता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि वे अपना हक कैसे हासिल करे और अपने आर्थिक सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन में ऐसी गति पकड़े कि वह विकास के पथ पर अग्रसर हो। एक ही रास्ता नजर आता है कि जनता एकजुटता पर विश्वास करे और सूचना के अधिकार को समङो और निडर होकर उसका उपयोग करे । यह कानून ऐसा हथियार है, जिसके सामने जितनी नकारात्मक ताकतें हैं, सब कमजोर हो जाती हैं और जनता सही जानकारी, सही जवाब मिलने में कामयाब होती है।

लेखिका समाजसेविका हैं

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