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छोटे बाजार की बड़ी दिक्कतें हैं यहां

‘बिहार’ देश का आर्थिक रूप से सर्वाधिक पिछड़ा राज्य है। सूबे की कमजोर आर्थिक स्थिति स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले और बाद, दोनों ही अवस्थाओं में रही है। यहां तक कि 1947 में औपनिवेशिक शासन के खात्मे के बाद भी राज्य की स्थिति बेहतर नहीं हुई। केंद्र सरकार की उपेक्षा के चलते अलग-थलग पड़े राज्य के खनिज संपन्न होने के लाभ को ‘समानता’ की नीति ने नवंबर 2001 में विभाजन से पूर्व बदल कर रख दिया, लिहाजा प्रदेश का आर्थिक ढांचा बिगड़ गया और विभाजन के बाद राजस्व की कमी के चलते राज्य की आर्थिक स्थिति लगातार बदतर होती गई, जबकि राजस्व स्नोतों की लंबी फेहरिस्त नव निर्मित राज्य झारखंड की जद में रह गई।

किसी भी देश अथवा राज्य के विकास की इमारत राज्य, बाजार और नागरिक (समाज) के तिपाये पर टिकी होती है। और आर्थिक विकास उपयरुक्त कारकों की मौजूदगी, नामौजूदगी अथवा उस तरीके पर निर्भर करता है, जिससे वे एक-दूसरे के पूरक होते हैं। बिहार की शासनिक संरचना पहले ही कमजोर थी। इन्फ्रास्ट्रक्चर न सिर्फ शिथिल पड़ती जा रही थी बल्कि विकास का शरीर पिलपिला हो चला था। मसलन व्यावहारिक रूप में न केवल संचालन श्रृंखला की कमी रही बल्कि प्राधिकारी अथवा सत्ताधारी भी अस्तित्वहीन नजर आने लगे थे। किसी भी राज्य में विकास का एजेंडा तब तक लागू नहीं हो सकता जब तक कि एक क्रियाशील प्रशासनिक मशीनरी व्यवहार में न हो। जमीनों पर स्थायी कब्जा अथवा जमींदारी के कारण यहां राजस्व संकलन सीमित था, लिहाजा प्रशासनिक मशीनरी पर व्यय भी सीमित था। राजस्व संकलन का कार्य बिचौलियों का विशेषाधिकार बन चला था और जमीन के बहीखाते को अपडेट करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं था। जाहिर है बिहार भूमि प्रबंधन के इतिहास से तो वंचित हो ही गया था, इस संकटग्रस्त राज्य का प्रशासनिक कुनबा शासन की संस्थागत स्मृति को भी उपाजिर्त नहीं कर सका। इससे न केवल राज्य की आंतरिक इमारत कमजोर हो गई थी बल्कि इसके प्राधिकार भी लगभग नगण्य हो चुके थे।

परिणामस्वरूप राज्य में अपराधी और आपराधिक संगठनों का तेजी से प्रादुर्भाव हुआ, जो सूूबे के लगभग हर क्षेत्र में सक्रिय रहे। तथापि मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के साथ ही शासन के मोर्चे पर एक बेंचमार्क स्थापित हो रहा है। राज्य का पुनरुत्थान हो रहा है। उदाहरण के तौर पर राज्य में अपराधियों के बेनकाब होने की दर में बढ़ोतरी हुई। सुशासन स्थापित हुआ है और संवैधानिक भूमि सुधार आयोग ने सरकार के दृष्टिकोण को स्पष्ट कर दिया है कि भूमि प्रबंधन के मुद्दे पर नया आख्यान लिखने की तैयारी है। बिहार में बाजार बहुत छोटा है। बाजार की मौजूदा कमजोरी यह है कि इसकी सेंट्रिक ग्रोथ स्ट्रैटेजी की पहुंच सीमित है। राज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा बाजार की संरचना के बाहर है। बाजार का विस्तार निवेश तथा आधुनिकता एवं कृषि उत्पादों में वृद्धि पर निर्भर करता है। पश्चिम बंगाल में पप्तेदारों को सीमित भूमि सुधार के अधिकार दिए जाने के बावजूद कृषि उत्पादकता में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। यह अनुभव बिना वस्तुविनिमय के किस तरह उम्दा उत्पादन की शुरुआत की जा सकती है, यह बताता है। यहां समाज वाइब्रेंट और डायनमिक है। यद्यपि बिहार आर्थिक रूप से पिछड़ा है लेकिन सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के चलते यहां का समाज लगातार लोकतांत्रिक हुआ है। यहां अलोकतांत्रिक स्थिति उत्पन्न होने की आशंका बहुत कम रह गई है। दक्षिण और पश्चिम भारत, जहां कि भूमि की असमानता काफी कम है, की अपेक्षा बिहार में सामंती समाज है जहां उत्पादन में वृद्धि व्यावहारिक रूप से काफी कम है। इन सबके बावजूद बिहार के विकास का रास्ता आम नागरिकों से होकर गुजरता है।


‘बिहार’ देश का आर्थिक रूप से सर्वाधिक पिछड़ा राज्य है। सूबे की कमजोर आर्थिक स्थिति स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले और बाद, दोनों ही अवस्थाओं में रही है। यहां तक कि 1947 में औपनिवेशिक शासन के खात्मे के बाद भी राज्य की स्थिति बेहतर नहीं हुई। केंद्र सरकार की उपेक्षा के चलते अलग-थलग पड़े राज्य के खनिज संपन्न होने के लाभ को ‘समानता’ की नीति ने नवंबर 2001 में विभाजन से पूर्व बदल कर रख दिया, लिहाजा प्रदेश का आर्थिक ढांचा बिगड़ गया और विभाजन के बाद राजस्व की कमी के चलते राज्य की आर्थिक स्थिति लगातार बदतर होती गई, जबकि राजस्व स्नोतों की लंबी फेहरिस्त नव निर्मित राज्य झारखंड की जद में रह गई। किसी भी देश अथवा राज्य के विकास की इमारत राज्य, बाजार और नागरिक (समाज) के तिपाये पर टिकी होती है। और आर्थिक विकास उपयरुक्त कारकों की मौजूदगी, नामौजूदगी अथवा उस तरीके पर निर्भर करता है, जिससे वे एक-दूसरे के पूरक होते हैं। बिहार की शासनिक संरचना पहले ही कमजोर थी। इन्फ्रास्ट्रक्चर न सिर्फ शिथिल पड़ती जा रही थी बल्कि विकास का शरीर पिलपिला हो चला था। मसलन व्यावहारिक रूप में न केवल संचालन श्रृंखला की कमी रही बल्कि प्राधिकारी अथवा सत्ताधारी भी अस्तित्वहीन नजर आने लगे थे।

किसी भी राज्य में विकास का एजेंडा तब तक लागू नहीं हो सकता जब तक कि एक क्रियाशील प्रशासनिक मशीनरी व्यवहार में न हो। जमीनों पर स्थायी कब्जा अथवा जमींदारी के कारण यहां राजस्व संकलन सीमित था, लिहाजा प्रशासनिक मशीनरी पर व्यय भी सीमित था। राजस्व संकलन का कार्य बिचौलियों का विशेषाधिकार बन चला था और जमीन के बहीखाते को अपडेट करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं था। जाहिर है बिहार भूमि प्रबंधन के इतिहास से तो वंचित हो ही गया था, इस संकटग्रस्त राज्य का प्रशासनिक कुनबा शासन की संस्थागत स्मृति को भी उपाजिर्त नहीं कर सका। इससे न केवल राज्य की आंतरिक इमारत कमजोर हो गई थी बल्कि इसके प्राधिकार भी लगभग नगण्य हो चुके थे। परिणामस्वरूप राज्य में अपराधी और आपराधिक संगठनों का तेजी से प्रादुर्भाव हुआ, जो सूूबे के लगभग हर क्षेत्र में सक्रिय रहे। तथापि मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के साथ ही शासन के मोर्चे पर एक बेंचमार्क स्थापित हो रहा है। राज्य का पुनरुत्थान हो रहा है। उदाहरण के तौर पर राज्य में अपराधियों के बेनकाब होने की दर में बढ़ोतरी हुई। सुशासन स्थापित हुआ है और संवैधानिक भूमि सुधार आयोग ने सरकार के दृष्टिकोण को स्पष्ट कर दिया है कि भूमि प्रबंधन के मुद्दे पर नया आख्यान लिखने की तैयारी है। बिहार में बाजार बहुत छोटा है।

बाजार की मौजूदा कमजोरी यह है कि इसकी सेंट्रिक ग्रोथ स्ट्रैटेजी की पहुंच सीमित है। राज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा बाजार की संरचना के बाहर है। बाजार का विस्तार निवेश तथा आधुनिकता एवं कृषि उत्पादों में वृद्धि पर निर्भर करता है। पश्चिम बंगाल में पप्तेदारों को सीमित भूमि सुधार के अधिकार दिए जाने के बावजूद कृषि उत्पादकता में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। यह अनुभव बिना वस्तुविनिमय के किस तरह उम्दा उत्पादन की शुरुआत की जा सकती है, यह बताता है। यहां समाज वाइब्रेंट और डायनमिक है। यद्यपि बिहार आर्थिक रूप से पिछड़ा है लेकिन सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के चलते यहां का समाज लगातार लोकतांत्रिक हुआ है। यहां अलोकतांत्रिक स्थिति उत्पन्न होने की आशंका बहुत कम रह गई है। दक्षिण और पश्चिम भारत, जहां कि भूमि की असमानता काफी कम है, की अपेक्षा बिहार में सामंती समाज है जहां उत्पादन में वृद्धि व्यावहारिक रूप से काफी कम है। इन सबके बावजूद बिहार के विकास का रास्ता आम नागरिकों से होकर गुजरता है।

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