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बदलती दुनिया और रुके हुए लोग

हाल ही में महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव खत्म हुए हैं। मीडिया में आई रिपोर्टो से यह बात भी साफ है कि आम आदमी का राजनीतिज्ञों और राजनीतिक दलों से मोह भंग हो रहा है। कांग्रेस ही नहीं सभी पार्टियां परिवारवाद से ग्रस्त हैं। इन चुनावों में बड़ी संख्या में नेताओं के बेटे-बेटियां, भतीजे-भतीजियां, बहू व दामाद चुनाव मैदान में उतरे।

निराशापूर्ण वातावरण के बीच सकारात्मक राजनीति की खबरें ताजा हवा के झाेंके की तरह लगती हैं। लगता है कि एक अलग मार्ग भी संभव है। सितंबर में महाराष्ट्र के चीनी उत्पादक इलाके सांगली जिले के कुछ गांवों और कस्बों में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। जैसा कि आमतौर पर होता है दंगों के बाद खबरों की बाढ़ आ जाती है और जब शांति लौटी तो खबरें भी खत्म हो गईं। लेकिन खबरों की बाढ़ के बीच इस इलाके के एक गांव कवठेपीरण का नाम उभर कर सामने आया।

कवठेपीरण पश्चिम महाराष्ट्र के अन्य गांवों जैसा ही है जिसकी आबादी करीब 15,000 है। लेकिन अब कई कारणों से यह गांव अलग दिखता है। अपवाद ही कवठेपीरण की कहानी को दिलचस्प बनाता है। सांप्रदायिक दंगों के कारण यह गांव खबरों में आया। दंगे का कारण इंटरनेट पर दिखाया गया एक भड़काऊ वीडियो तथा गणेश चतुर्थी पर एक पंडाल में शिवाजी और अफजल खान में हुई लड़ाई का प्रदर्शन था। दंगे के दौरान गांव की मस्जिद को नुकसान पहुंचा।

इसके बाद पीढ़ियों से गांव में रह रहे सौ मुस्लिम परिवार डर कर गांव छोड़ना चाहते थे। लेकिन कवठेपीरण गांव की महिलाओं ने हस्तक्षेप कर मुसलमानों के पलायन को रोक दिया। गांव में पंचायत हुई जिसकी सभी 17 सदस्य महिलाएं थीं। उन्होंने मस्जिद की मरम्मत कराने का फैसला लिया और व्यक्तिगत रूप से मुस्लिम परिवारों से मिलकर उनकी सुरक्षा का आश्वासन दिया। हमारे मीडिया में सकारात्मक समाचार को समाचार नहीं समझा जाता।

लेकिन इस गांव में आए बदलाव की कहानी दोहराने की जरूरत है क्योंकि इसे देखकर पता चलता है कि मौजूदा चुनावी राजनीतिक व्यवस्था में भी सकारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं। सन् 2000 तक कवठेपीरण अन्य गांवों से अलग नहीं था। नशाखोरी, अपराध और गंदगी ही इस गांव की पहचान थी। गांव पर भीमराव माने नामक आदमी और उसके शराबी साथियों का राज था। और कोई कुछ कह नहीं सकता था।

सन् 2001 में अचानक भीमराव का हृदय परिवर्तन हुआ, हालांकि कुछ लोग इस पर संदेह करते हैं। उसने 2 अक्तूबर को ग्राम सभा की बैठक बुलाई। कवठेपीरण गांव की महिलाओं ने हालात पर आक्रोश व्यक्त किया और धमकी दी कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो वे सब मिलकर गांव छोड़ चली जाएंगी। यह सुनकर भीमराव ने शराब छोड़ने की सार्वजनिक घोषणा की और वायदा भी किया कि भविष्य में वह गांव में शराब नहीं बिकने देगा।

भीमराव का इशारा मिलते ही महिलाओं ने गांव में मौजूद शराब की सभी दुकानें और अड्डे नष्ट कर दिए। यह अभियान यहीं नहीं रुका। गांव में अगर कोई शराब पीता दिखाई देता तो वे उसका सिर मुंडा कर उसे गधे पर बिठा कर घुमाती थीं। वैसे तो यह लोकतांत्रिक तरीका नहीं है, लेकिन महिलाओं को लगता था कि नशाखोरी से मुक्ति के लिए सार्वजनिक अपमान करना ही कारगर उपाय है।

इसके बाद हुए चुनाव में महिलाएं पंचायत में चुनी गईं। उत्साहित हो उन्होंने गांव की सफाई का अभियान छेड़ा। परिणामस्वरुप उनके गांव को स्वच्छता के लिए राज्य सरकार का संत गडेबाबा अभियान पुरस्कार मिला। खुले में शौच पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए तीन साल बाद सन् 2006 में इस गांव को केंद्र सरकार का निर्मल ग्राम पुरस्कार भी मिला। आज गांव के ज्यादातर घरों में निजी शौचालय हैं। जो लोग घरों में शौचालय नहीं बनवा सकते उनके लिए सार्वजनिक शौचालय बनाए गए हैं।

महिलाएं इतने पर ही नहीं रुकीं। उन्होंने परिवारों को बायोगैस संयंत्र लगाने और हर महिला को स्वयं सहायता समूह में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। पंचायत ने गांव में 110 सौर उर्जा लैंप लगाए और सूखे व गीले कचरे को अलग-अलग छांटना अनिवार्य कर दिया। कीटाणुओं से बनी खाद बेचकर इस गांव ने 70,000 रुपए भी कमाए।

कवठेपीरण के बारे में जितना लिखा गया है, काम उससे कहीं अधिक हुआ है। लोग इसके बारे में और भी बहुत कुछ जानना चाहते हैं। उदाहरण के लिए सकारात्मक कार्यो के बाद क्या गांव के युवाओं, खासकर युवा महिलाओं, के व्यवहार में कोई बदलाव आया है? महिला पंचायत की सदस्यों ने जिस तरह गांव का कायाकल्प किया है क्या उससे उन्हें प्रेरणा मिलती है? क्या अब अधिकांश युवतियां चुनावी राजनीति में आना चाहती हैं? क्या राजनीतिक व्यवस्था के बारे में कस्बों और शहरों में रहने वालों के मुकाबले उनका दृष्टिकोण कम आलोचनात्मक हुआ है?

महाराष्ट्र की तरह हरियाणा में भी राजनीतिक परिवारवाद पनप रहा है। इसके अलावा भी वहां कुछ गंभीर समस्याएं हैं, जो अब तक राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाई हैं। इनमें से एक है इज्जत के नाम पर हो रही हत्याएं। हाल ही में दिल्ली से मात्र सौ किलोमीटर दूर सांघी गांव की एक घटना प्रकाश में आई जिससे पता चलता है कि भले ही देश के कुछ हिस्सों में औरतों ने तरक्की कर ली है, बहुतेरे भाग ऐसे हैं जहां वे अब भी सड़ी-गली सामाजिक परंपराओं से बंधी हैं और उन्हें न्यूनतम मानवीय अधिकार भी प्राप्त नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि जिस सांघी गांव का जिक्र हुआ है वह हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के गृह जिले में है।

सांघी गांव की लड़कियों की कहानी उस खाप पंचायत व्यवस्था से जुड़ी है, जिसका वहां के लोगों की जिंदगी से गहरा रिश्ता है। सांघी और उसके निकटवर्ती 12 गांवों में एक ही खाप के लोग रहते हैं और यहां के पुरुषों व महिलाओं को आपस में विवाह करने की अनुमति नहीं है। यदि कोई शादी करता है तो उसे गांव छोड़कर भागना पड़ता है। पकड़े जाने पर तयशुदा मौत मिलती है। लड़कियों के सामने तो कोई विकल्प ही नहीं होता। उनका परिवार ही उन्हें कीटनाशक पीने को मजबूर करता है अथवा उन्हें फांसी पर लटका दिया जाता है। इस राज्य में स्त्री-पुरुष जनसंख्या का अनुपात सबसे कम है। भ्रूण हत्या से बचकर जो लड़कियां जन्म ले लेती हैं, इस बात की कोई गारंटी नहीं कि बड़े होने पर वे जिंदगी अपनी मर्जी से जी सकेंगी।

हां, सांघी और कवठेपीरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक स्थान पर तरक्की और बदलाव दिखाई पड़ता है, आशा जगती है। दूसरे स्थान को देखकर दुख होता है कि गलत परंपराओं के कारण महिलाएं आजादी और मानवीय अधिकारों का उपभोग भी नहीं कर पा रही हैं।
 
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

kalpu.sharma @ gmail. com

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