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विवाद : हम सबके माथे पर झूठ

इसे संयोग ही कहा जाना चाहिए कि हिंदी की कुछ प्रसिद्ध लेखकों की पत्नियां उनकी मृत्यु के बाद उनकी छवि को धोने-पोंछने और मांजने का काम करती रही हैं। अपने जीवन काल में वे कैसे थे, इसे वे नहीं जानना चाहतीं। उन्होंने तो जिस आदर्श देवता के चरणों में अपना जीवन अर्पित किया था, वही मूर्ति उनके मन में आज भी सुरक्षित है और वे उसे किसी भी कीमत पर बदलना नहीं चाहती हैं। 

मन्नू भंडारी ने धर्मवीर भारती को लेकर जिस फिल्म ‘सूर्य के वंशज’ का जिक्र किया है, उस पर हम लोगों ने खुद बहुत बहस की है। 1979 माया के नवम्बर अंक में जो कुछ छपा, उसमें इस विवादित फिल्म के पूरे विवरण मौजूद हैं और इसकी तसदीक तब के माया के ब्यूरो प्रमुख विकास झा ने भी की और मध्य प्रदेश के सुधीर सक्सेना ने भी की। बल्कि विकास जी ने तो उन दिनों चंडीगढ़ में रहने वाले (अब दिवंगत) बाबूलाल शर्मा से भी बात कराई, जिनका कहना था कि वह लेख स्वयं उन्होंने ही लिखा था।

दुर्भाग्य से माया का वह अंक अभी तक उपलब्ध नहीं हो पाया है। मगर इस सत्य को रेखांकित करना जरूरी है कि ‘मुनादी वाले’ धर्मवीर भारती इमरजेंसी में इंदिरा गांधी के कितने अनुकूल हो गए थे और स्वयं पुष्पा भारती ने ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में राजीव गांधी का भावभीना साक्षात्कार लिया था और उसमें राजीव जी की ‘बड़री अखियां’ और मोहक आंखों का मुग्ध चित्रण किया था।

मन्नू ने जिस फिल्म के संदर्भ में भारती जी का जो जिक्र किया है, उसकी अधिकांश सामग्री पंकज बिष्ट की दी हुई है। उस समय भी पंकज समयान्तर पत्रिका निकालते थे। पुष्पा जी कहती हैं कि ‘सूर्य का स्वागत’ कविता भारती जी ने इस फिल्म के लिए नहीं लिखी, बल्कि एंजलो सकलयानो नाम के ग्रीक कवि की कविता को उद्धृत किया है।

समझ में नहीं आता कि उनका यह तर्क कैसे यहां जायज है। कोई भी रचना कभी भी लिखी जा सकती है, देखना यह है कि उसका उपयोग बाद में किस तरह किया गया है। मेरी समझ में नहीं आता कि अगर कुछ लेखकों और बुद्धिजीवियों ने इंदिरा गांधी, संजय  या राजीव की प्रशंसा में कुछ लिखा या कह भी दिया, तो उनके साहित्यिक अवदान पर क्यों धब्बा लगना चाहिए।

श्रीकांत वर्मा भले ही इंदिरा गांधी के काफी नजदीकी माने जाते रहे हों, मगर उनकी ‘मगध’ सिरीज की कविताएं, रघुवीर सहाय की कविताएं और आलेख, कमलेश्वर की कहानियां और उपन्यास हिंदी साहित्य की अमूल्य निधियां हैं। लोग भारती की भी इस तथाकथित कलंकगाथा को भूल जाएंगे, मगर ‘अंधा युग’, ‘कनुप्रिया’, ‘सात गीत वर्ष’ और ‘सूर्य का सातवां घोड़ा’ जैसी रचनाएं आने वाली पढ़ियों के लिए अर्थवान बनी रहेंगी।

ज्यादा अच्छा हो कि पुष्पा जी भी इसे भूल जाये, क्योंकि वह इस कीचड़ को मथ कर कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगी, बल्कि ये सारे प्रयास बूमरैंग की तरह उनके उद्देश्यों को भी नुकसान पहुंचाएंगे। भारती ने ही लिखा है कि ‘हम सब के माथे पर झूठ, हम सब के हाथों में टूटी तलवारों की मूठ’ क्या इस स्वीकारोक्ति के बाद भी कुछ कहने को बचा रहता है।

मेरी समझ में नहीं आता कि उन्हें आत्मकथा के किसी प्रसंग को झूठा या सच्च कहने का अधिकार किस आधार पर है। या तो वे एक दूसरे सच के गवाह रहे हों या उनके पास ऐसे प्रमाण हों कि वे आत्मकथा के उन अंशों को झूठा सिद्ध कर सकें।

बहुत से लोग हरिवंश राय बच्चान की आत्मकथा ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ के कुछ प्रसंगों को लेकर आज भी कहते हैं कि उन्हें तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। अब या तो वे उस सत्य का अपना पक्ष लिखे या उसे झूठ प्रमाणित करें। केवल झूठ है, झूठ है का ढोल पीटने वालों के पास क्या सच के कुछ अकाटय़ सबूत हैं।

मन्नू ने जो बात कही है, उसे झूठा प्रमाणित करने के लिए पुष्पा जी को अपना पक्ष भी सामने रखना चाहिए। मन्नू ने तो अपनी आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’ में तो स्वयं मुङो धो-पोंछ डाला है और मैं शालिग्राम की बटिया की तरह स्वच्छ और निर्मल हो उठा हूं। मुङो अब इसके लिए किसी वकील की जरूरत नहीं।
  
लेखक वरिष्ठ कथाकार हैं और हंस पत्रिका के संपादक हैं

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