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अपने गिरेबान में झांके चीन

अरुणाचल प्रदेश पर नजरें गड़ाने से पहले चीन अपने गिरेबान में झांके। जहां बलपूर्वक उसने तिब्बत पर कब्जा किया हुआ है। अरुणाचल में भारी मतदान वहां के निवासियों की भारतीय लोकतंत्र में आस्था व्यक्त करता है। यदि आम तिब्बतियों से मतगणना कराई जाये तो वे एक दिन भी चीन के साथ नहीं रहना चाहेंगे। चीन में तो लोकतंत्र है ही नहीं, सिर्फ उच्च आर्थिक विकास दर के बल पर चीन अपने को संभाले हुए है और  चीनी नेतृत्व विकास  के बल पर लोकतंत्र की मांग करने वाली जनता को दबा देता है। चीन में जैसे ही विकास दर थोड़ी ढीली पड़ेगी जनता का असंतोष उभरेगा । थिएन-आन-मन चौक पर हुआ नरसंहार वहां के लोग और दुनिया भूली नहीं है। ऐसा होने पर चीन के लिए अपने अस्तित्व को बचाना मुश्किल होगा और सोवियत संघ की तरह चीन भी बंट जाएगा। अरुणाचल को तो छोड़ो, चीन को तिब्बत बचाना मुश्किल हो जाएगा। भले ही भारत की सैन्य क्षमता और आर्थिक विकास दर चीन से कम है, किन्तु हमें लोकतंत्र पर गर्व है। हमें चीन की तरह अपने ही बोझ तले टूटने का खतरा नहीं है।
रवि दत्त सेमवाल, बौराड़ी, नई टिहरी

अपराध व पुलिस प्रशासन
जिस तरह से उत्तराखंड में अपराधों को ग्राफ बढ़ता जा रहा है उससे तो यही प्रतीत होता है कि आने वाले समय में देवभूमि क्राइमभूमि के नाम से विख्यात होगी। लगातार हो रही हत्याएं, अपहरण, बलात्कार की घटनाओं से प्रदेश की छवि खराब हो रही है। घरों में घुसकर लूटपाट और हत्याओं से लोग खुद को अपने घरों में भी असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। लड़कियों को अकेले बाहर भेजने से माता-पिता को यह चिंता सताती है कि कहीं कोई उनसे अभद्र व्यवहार न करे।  पुलिस प्रशासन की कमजोर, सुस्त व कामटालो कार्य-प्रणाली से अपराध को बढ़ावा मिल रहा है। यदि कोई गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने कोतवाली जाता है तो उसे पहले टालने का प्रयास किया जाता है। यदि किसी कारणवश गुमशुदा व्यक्ति की हत्या हो जाती है तो पुलिस गुनहगारों को पकड़ने में असमर्थ नजर आती है। पुलिस के इसी रवैये के कारण आज लोगों का पुलिस से विश्वास उठ चुका है। इस बढ़ते अपराध को रोकने के लिये सरकार को कठोर कदम उठाने होंगे।
प्रीतिराज, देहरादून

केंद्र व राज्य में सामंजस्य नहीं
पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का बयान कि उत्तराखंड में बाघों द्वारा बच्चों को मारने की केन्द्र सरकार को कोई खबर नहीं है, हतप्रभ करने वाली है। उत्तराखंड में नित्य ही कोई न कोई बच्चा और महिला गुलदार और भालुओं का शिकार हो रहा है। आम जनता कैसे मान ले कि केन्द्र सरकार बेखबर है?  यह कमी तो वन विभाग और उत्तराखंड सरकार की है, जो सूचना केन्द्र सरकार तक नहीं पहुंचती। हमारा सूचना और जनसंपर्क विभाग भी क्या सोया हुआ है? उस परिवार का हाल जानिए जिसके घर का चिराग बुझ गया हो। उन मां-बाप की मनोदशा को समझिए जो बच्चे की याद में तिल-तिल कर जीते-मरते हैं। ठीक है धरती पर जानवरों का भी उतना हक है जितना इंसान का, पर इसमें निर्धन ग्रामीण जनता क्या करे, जो जंगल से अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। अपने बुढ़ापे की लाठी को गंवा कर वे किस हाल में जीते हैं ये उनके घर जाकर पूछिए, वो किस परिस्थिति में जीवन-यापन कर रहे हैं। इस गंभीर विषय पर सभी सरकारों और वन विभाग को सोचना चाहिए।
डा. अजय बाली, बौराड़ी, नई टिहरी

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