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यूपी के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों का संकट

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों का संकट गहरा गया है। राजकीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। अधिकांश विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्तियाँ मुकदमेबाजी में फँसी हैं। कुछ विश्वविद्यालयों में अंदरूनी राजनीति के कारण नई नियुक्तियाँ नहीं हो पा रही हैं। राज्य में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के दावे हो रहे हैं। जबकि हालत इतनी बिगड़ गई है कि शासन को कुलपतियों को बुलाकर बैठकें करनी पड़ रही हैं।

शासन ने विश्वविद्यालयों में खाली पड़े शिक्षकों के पदों का जो ताजा ब्योरा एकत्र किया है वह चौंकाने वाला है। लखनऊ विवि में शिक्षकों के कुल स्वीकृत 516 पद हैं जिनमें 144 पद खाली पड़े हैं। विवि ने आचार्य के 27, उपाचार्य के 42 व प्रवक्ता के 38 पद कई साल से विज्ञापित हैं। लेकिन नियुक्ति का महूर्त नहीं निकल रहा। आचार्य के तीन पदों पर कोर्ट का स्टे है।

33 पद नियमितिकारण से भरे जाने हैं। यह नियमितिकरण पिछले आठ साल से लंबित है। रुहेलखण्ड विवि में शिक्षकों के 17 पद खाली हैं जिनमें 12 पद विज्ञापित हैं। लेकिन चयन प्रक्रिया सुस्त गति से चल रही है। आगरा में शिक्षकों के 40 व मेरठ के 25 पद खाली हैं। लेकिन अभी यहाँ विज्ञापन की प्रक्रिया तक पूरी नहीं हुई। झांसी में 14, कानपुर में 12 व जौनपुर विवि में शिक्षकों के 36 पद खाली पड़े हैं। लेकिन चयन प्रक्रिया अब तक नहीं शुरू हो सकी है।

वाराणसी के काशी विद्यापीठ में शिक्षकों के 32 पद खाली हैं। आचार्य के तीन पदों पर चयन प्रक्रिया पूर्ण हुई लेकिन नतीजें घोषित करने पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। यही उपाचार्य व प्रवक्ता पदों के साथ हुआ। उपाचार्यो के सात व प्रवक्ताओं के छह पदों पर शिक्षक चयनित हुए लेकिन आदालत ने चयन प्रक्रिया रोक दी। काशी विद्यापीठ ने में कई नियुक्तियाँ तो सतर्कता जाँच के दायरे में हैं।

गोरखपुर विवि में शिक्षकों के 124 पद खाली हैं। यहाँ तदर्थ शिक्षकों के नियमितिकरण को लेकर अलग विवाद चल रहा है। अंदरूनी राजनीति के कारण नई नियुक्तियाँ नहीं होने दी जातीं। नियुक्तियों में रोस्टर निर्धारण को लेकर एक मामला तो सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।

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