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सुगंधित पौधों की खेती से होगा आर्थिक विकास

देवभूमि के नाम से विख्यात उत्तराखण्ड में सुगंध देने वाले पौधों की खेती को बढ़ावा देकर अब स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के प्रयास किए जाएंगे।

उत्तराखंड राज्य के विभिन्न जिलों में पहाडों पर पाए जाने वाले और सुगंधित पौधों के नाम से प्रसिद्ध हाईब्रिड जामारोजा पौधे की व्यापक स्तर पर खेती के लिये सरकारी और निजी स्तर पर काम शुरू कर दिया गया है।

राज्य के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने बातचीत में कहा कि उत्तराखंड में जैसे दुर्लभ पौधे पाए जाते हैं वैसे पूरी दुनिया मे कहीं नहीं मिलते इसलिये इन पौधों की खेती को बढ़ावा देकर राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जायेगा।

राज्य के सुगंधित पौधा अनुसंधान विकास केन्द्र के प्रभारी वैज्ञानिक नपेन्द्र चौहान ने बताया कि जामारोजा के साथ साथ लेमन ग्रास, केमोआईल, गुलेबबूना तथा गुलाब की खेती के माध्यम से भी पहाड़ी क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति मजबूत की जायेगी और इसके साथ साथ इसके तेलों और अर्क की सुगंध देश के साथ साथ विदेशों में भी फैलायी जायेगी।

उन्होंने बताया कि इन पौधों की नई प्रजाति भी विकसित की जायेगी। इन पौधों से जहां सुगंधित इत्र बनाये जाते हैं वहीं इसका उपयोग सौन्दर्य प्रसाधन की सामग्री साबुन तथा विभिन्न प्रकार के परफ्यूम तथा अन्य सामानों में किया जाता है।

राज्य सरकार ने राज्य में सुगंधित पौधों की खेती के लिये अब तक कुल 50 समूह विकसित किए हैं।

राज्य के बागवानी विभाग के सूत्रों ने बताया कि पिछले वर्ष राज्य में 102.59 हैक्टेयर क्षेत्र में सुगंधित पौधों की खेती की गई थी और उसके माध्यम से करीब 600 काश्तकारों को लाभान्वित किया गया था।

सूत्रों ने बताया कि गत वर्ष तो इन पौधों के माध्यम से काफी मात्रा में सुगंधित तेल निकाला गया और इसका इस्तेमाल विभिन्न उत्पादों के काम में लाया गया। राज्य सरकार ने सुगंधित पौधों की खेती को प्रोत्साहित करने के लिये नौ प्रजातियों का समर्थन मूल्य भी घोषित किया है। वर्ष 2007—08 में तो 49 प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से 2598 किसानों को प्रशिक्षिण दिया गया था जबकि गत वर्ष तीन हजार से भी अधिक किसानों
ने प्रशिक्षिण लिया था।

सूत्रों के अनुसार ढाई हेक्टेयर या उससे अधिक क्षेत्रफल में हुई खेती पर आसवन संयंत्र स्थापित करने पर 95 प्रतिशत अनुदान भी दिया जाता है। राज्य में अब तक 35 आसवन केन्द्र स्थापित किये जा चुके हैं। चौहान ने बताया कि जामारोजा पौधे की यह विशेषता है कि यह बंजर भूमि के साथ साथ पहाडों की ऊंचाई पर आसानी से पैदा हो जाता है। उन्होंने कहा कि जामारोजा लेमनग्रास और पामारोजा पौधों का संकर (हाईब्रिड) पौधा है जिसमें से तेल निकलता है और इसी तेल का इस्तेमाल सुगंधित साबुन  खाद्य सामाग्री  पाउडर तथा अन्य सुगंधित तेलों में किया जाता है।

चौहान ने कहा कि एक हेक्टेयर में करीब चार सौ क्विंटल जामारोजा की घास पैदा की जाती है जिससे दो क्विंटल तेल निकलता है। इसकी पैदावार से वर्षा के कारण होने वाले पहाडों की जमीन के कटाव को भी रोका जा सकता है। यह ऐसे क्षेत्रों में भी पैदा किया जा सकता है जहां कम पानी होता है। और तो और बंजर भूमि तथा ऊंचे नीचे इलाकों में भी इसकी पैदावार हो सकती है।

वैज्ञानिक चौहान ने बताया कि फिलहाल तो इसकी मांग देश के विभिन्न हिस्सों से होती है लेकिन एशियाई देशों तथा अन्य देशों में इसके निर्यात की अपार संभावनायें हैं।

उन्होंने कहा कि एक अन्य सुगंधित पौधा गुलेबबूना का इस्तेमाल दवा बनाने में भी होता है और यह 50 हजार रूपये प्रति किलोग्राम तक बिक जाता है। लेमनग्रास से चूंकि नीबू की खुशबू मिलती है इसलिये इसका इस्तेमाल नीबू का फ्लेवर देने के लिये साबुन और अन्य सामानों में किया जाता है।

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