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दो टूक (19 अक्तूबर, 2009)

इस बार की दीवाली दिल्ली की आबोहवा को थोड़ा कम जहर दे कर गई। इसके पीछे गर्म मौसम के अलावा पर्यावरण संबंधी जागरूकता का भी योगदान है।

अपने वातावरण को लेकर यह प्रतीकात्मक जागरूकता अगर एक आंदोलन का रूप ले सके तो हम अपनी दुनिया को कुछ और रहने लायक बना पाएंगे। दरअसल जरूरत इस बात को दिमाग में बिठाने की है कि एक अच्छे वातावरण में ही हमारा सुख निहित है।

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  • Web Title:दो टूक (19 अक्तूबर, 2009)