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राजनीति का एजेंडा बना रहे हैं राहुल

अपने एक दोस्त और संपादकीय सहयोगी से बात हो रही थी, वे राहुल गांधी से थोड़े नाराज नज़र आ रहे थे। कारण राहुल का यह कहना कि हमें पाकिस्तान पर पांच मिनट से ज्यादा वक्त नहीं बर्बाद करना चाहिए। तर्क था कि एक व्यक्ति जो प्रधानमंत्री होने वाला है, उसे इस तरह की छोटी बात नहीं करनी चाहिए। ये विदेश नीति का मामला है और सोच-समझकर बोलना चाहिए। उनकी बात सही हो सकती है, लेकिन मैं सहमत नहीं था। मुझे लगा कि शायद बात पांच मिनट नहीं उसके आगे की है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि हम भारतवासी पाकिस्तान को  लेकर इतने ‘आबसेस्ड’ हैं कि उसकी हर बात को जरूरत से ज्यादा अहमियत देते हैं? छोटा सा बयान आया नहीं कि हम रियेक्ट करने को उतावले हो जाते हैं। सवाल इस बात का भी नहीं कि पांच मिनट में ही राहुल ने बीजेपी और संघपरिवार के राष्ट्रवाद की हवा निकाल दी। जो राष्ट्रवाद को पाकिस्तान से इतर परिभाषित ही नहीं कर सकते और अगर पाकिस्तान न हो तो शायद उन्हें अपने राष्ट्रवाद को नये सिरे से खोजना पड़े।

ध्यान से देखें तो लोकसभा चुनावों के बाद से ही राहुल कुछ न कुछ ऐसा जरूर कह रहे हैं कि जो लोगों को चौंका रहा है। चुनाव के दौरान दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस में वे नीतीश कुमार की तारीफ कर बैठे। मीडिया समेत तमाम लोगों ने नाक भौं सिकोड़ी और सर्टिफिकेट दे दिया कि उन्हें राजनीति की समझ नहीं है। और शायद गठबंधन धर्म को नहीं समझते, यानी वे नासमझ हैं और उन्हें अभी और ट्रेनिंग की आवश्यकता है। यही कुछ लोग तब भी कह रहे थे, जब राहुल फामरूले के तहत यूपी में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया और बिहार में भी लालू को झटका दे कांग्रेसी कूद पड़े। बिहार में तो नहीं, लेकिन यूपी में नतीजे देख राजनीतिक पंडितों की आँखें फटी की फटी रह गई, जब कांग्रेस 21 सीट ले उड़ी और बीएसपी से आगे दिखी। और अब ये कहा जाने लगा है कि राहुल की लाइन सही थी और शायद इसी रास्ते पर चलकर कांग्रेस को केंद्र में बहुमत मिल सकता है।

महाराष्ट्र चुनावों में भी कांग्रेस के अकेले लड़ने की बात उठी। यहां तक कि राहुल फॉर्मूले की नकल पर बीजेपी से भी ये आवाज आई कि पार्टीको गठबंधन की बैसाखी को छोड़कर अपनी जमीन तलाशनी होगी, अगर उसे केंद्र में अपने बल पर सरकार बनाने के सपने को साकार करना है। हिम्मत कर हरियाणा में बीजेपी ने यह प्रयोग कर भी लिया। न चौटाला के साथ, न भजनलाल के साथ, बस अकेले। यानी राहुल कहीं न कहीं कुछ ऐसा कर या कह रहे हैं, जो भारतीय राजनीति में नया है और लोगों को चौंका रहा है, यानी वो राजनीतिक नक्शे पर एजेंडा सेट कर रहे हैं। जाने-अनजाने दूसरे लोग या दल उसकी नकल करने की कोशिश भी कर रहे हैं।

पिछले दिनों राहुल ने आम जनता से मिलने का नया रास्ता खोजा है। वे अचानक किसी गांव या बस्ती में जाते हैं और वहां किसी दलित या गरीब के घर पर रात गुजारते हैं, उसी के हाथ का बना खाना उसी के बर्तन में खाते हैं और उसी की खाट पर सो जाते हैं। और फिर सुबह उसी के नल पर बिना किसी संकोच के नहा भी लेते हैं। शुरू में लोगों ने काफी मुंह बिचकाया, मायावती ने ये तक कह दिया कि राहुल जब दलित बस्ती से निकल कर दिल्ली जाते हैं तो रगड़-रगड़ कर नहाते हैं, मतलब राहुल का ये सब एक ढकोसला है और ये सब वो राजनीति के लिए कर रहे हैं।

लेकिन जब लोकसभा के नतीजे सामने आये तो अब मायावती ने रियेक्ट करना बंद कर दिया। दो अक्तूबर को राहुल ने कांग्रेसियों से दलित बस्तियों में जाने को कहा, कुछ गये भी तो कुछ को महज नाटक करने के लिए डांट भी खानी पड़ी। हाल ये कि पिछले दिनों मुलायम को अपनी पार्टी वालों को दलित बस्तियों में जाने की नसीहत देनी पड़ी। खुद आरएसएस प्रमुख भागवत ने राहुल की तारीफ की तो बीजेपी भी सकते में आ गयी। सवाल फिर वही आ खड़ा हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं राहुल अपनी ‘नासमङी’ में दूसरों के लिए एजेंडा सेट कर रहे हैं?

इसमें कोई दो राय नहीं कि चाहे राहुल का युवाओं के बीच घूमकर उनके लिये राजनीति को एक करियर बनाने के लिये आकर्षित करना हो या फिर ट्रैफिक जाम में फंसने के डर से मेट्रो में सैर करना या फिर ड्राइवर से बात करना, या संसद के अंदर कलावती का जिक्र करना हो, राहुल कुछ न कुछ ऐसा कर रहे हैं, जो भारतीय राजनीति की ‘स्टीरियो टाइप’ इमेज को तोड़ता है और प्रतिद्वंद्वियों के लिए सोचने और करने को मजबूर करता है।

पचास के दशक  में नेहरू और कांग्रेस को जेपी जैसे लोग भी चुनौती नहीं दे पाये, क्योंकि वे नेहरू से अलग नहीं सोच पाये। लेकिन साठ के दशक में राममनोहर लोहिया ने ‘बैकवर्ड पॉलिटिक्स’ और ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का नारा दे नयी राजनीति की दिशा तय की और 1967 के चुनाव में अपराजेय कांग्रेस में पहली दरार पड़ी।

बाद में इमरजेंसी के दौरान जेपी और वीपी सिंह ने इस ‘मोमेंटम’ को आगे बढ़ाया, लेकिन अस्सी के उत्तरार्ध और नब्बे की शुरुआत में देश की राजनीति बीजेपी और आडवाणी के इर्द-गिर्द इसलिये घूमी, क्योंकि वे बाकियों के लिए ‘एजेंडा सेट’ कर रहे थे और दूसरे सिर्फ ‘रियेक्ट’ कर रहे थे। आजादी के पहले देखें तो स्वतंत्रता आंदोलन में तब जान आई, जब गांधी जी ने गोखले, तिलक और जिन्ना से अलग ‘अहिंसा और सत्याग्रह’ का नारा दिया और ‘संविधानवाद और विचार विमर्श’ से अलग अंग्रेजों से पूरी तरह से ‘असहयोग’ करने और ‘पूर्ण स्वराज’ का नारा बुलंद किया।

राहुल जो कर रहे हैं वे नया है और लोगों को नए तरह से सोचने को मजबूर कर रहा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले कुछ साल में नेताओं की छवि इतनी गिरी है और राजनीति को लेकर नाराजगी की हद तक उदासीनता है। इसलिये भी कि इनके पास कहने के लिए कुछ भी नया नहीं है। ये छोटी उपलब्धि नहीं जो युवा वर्ग राजनीति से नफरत करता था, वही अब एनएसयूआई के लिखित टेस्ट में बैठ कर पार्टी में शामिल होने की सोच रहा है। ऐसे में राहुल को छोटा जानकर ‘इग्नोर’ करना कइयों को भारी पड़ सकता है। अपने मित्र से भी यही कहूंगा कि राहुल की बात से असहमत होने का उन्हें पूरा अधिकार है, लेकिन उस पर गौर करें खारिज नहीं, न जाने किस भेष में बाबा मिल जाये।

लेखक आईबीएन-7 में मैनेजिंग एडीटर हैं

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