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उर्दू मीडिया : नोबेल से नवाज़ने का मतलब

नोबेल जैसा प्रतिष्ठित सम्मान मात्र ग्यारह दिनों के कार्यकाल में मिल जाना किसी अनहोनी से कम नहीं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। उनके राष्ट्रपति बनने और नोबेल प्राइज के लिए रजिस्ट्रेशन कराने की आखिरी तारीख में सिर्फ ग्यारह दिनों का अंतर है। नोबेल पीस प्राइज के लिए जब उनके नाम का ऐलान किया गया, सुनकर सभी दंग रह गए। जो इनाम कई बार नॉमिनेशन के बाद भी महात्मा गांधी जैसे आला दर्जे के नेता को नहीं मिल सका, वह एक बार में ही बराक ओबामा को मिल गया।

अमेरिकी आंतरिक और विदेश नीति से सर्वाधिक मुस्लिम देश प्रभावित हैं, इसलिए इनाम की घोषणा के साथ ही उदूर्र् मीडिया उनको लेकर बहस में उलझ गया है। ‘बराक ओबामा को अमन का नोबेल इनाम’, ‘ओबामा के लिए नोबेल इनाम का मतलब’, ‘ओबामा को बुश न होने का इनाम’, ‘ओबामा की जिम्मेदारियां बढ़ीं’, ‘मुस्तकबिल की वहशतनाक जंग’, ‘बराक ओबामा ने तेरह हजार अमेरिकी फौजी अफगानिस्तान में भेजने की मंजूरी दी’, ‘इजराइली जेलों में 335 बेकसूर बंद’, ‘फलस्तीनी हुक्मरां की दूरअंदेशी’-शीर्षक से लगातार खबरें, लेख, संपादकीय, समीक्षा छापे जा रहे हैं।

वुडरोल्सन और जिमी कार्टर के बाद ओबामा तीसरे अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, जिन्हें यह सम्मान मिला है। ‘हमारा समाज’ में सैयद अतहर अली कहते हैं, ‘जिस तरह ऐरे-गैरे को इनाम मिलने लगा है। नोबेल सम्मान को ठोस पहुंची है।’ ओबामा इंडोनेशिया में जब छात्र जीवन बिता रहे थे। ईरानी छात्र लीडर महमूद अहमद निजाद से बेहद प्रभावित थे। 1983 में लिखी अपनी पुस्तक ‘पिता से मिले सपने’ में ओबामा ने तत्त्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की नीतियों की खिल्ली उड़ाई थी। और व्हाईट हाउस की पॉलिसी में बदलाव लाने पर जोर दिया था।

अली कहते हैं, नोबेल कमेटी ने ओबामा की उन्हीं बरसों पुरानी नीतियों का सम्मानित किया है। आज वे जो कर रहे हैं, यह उनकी पचीस साल पुरानी सोच है। अहमद निजाद ईरान के राष्ट्रपति बनने ही मुल्क की पॉलिसियों में बदलाव ले आए। ‘रोजनामा राष्ट्रीय सहारा’ के लेटर टू एडीटर कॉलम में पटना के मोहम्मद वासे जफर सवाल उठाते हैं-‘सिर्फ बयान और अपील से कोई नोबेल इनाम का हकदार हो सकता है?’

ऐसे ही सवाल ओबामा को नोबेल मिलने पर नोबेल पाने उठा रहे हैं। 1973 में वियतनामी लीडर लेविस ने यह कहते हुए नोबेल लेने से मना कर दिया था कि अभी दुनिया में अमन नहीं आया है। जबकि ओबामा ने अब तक के कार्यकाल में रेस्तरां में पिज्जा खाने और बेसबाल खेलने के सिवाए कुछ ठोस नहीं किया।1983 में नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाले पोलैंड के लीडर लेक वालेशा भी मानते हैं कि ओबामा को यह पुरस्कार कुछ ज्यादा पहले दे दिया गया।

उर्दू पोर्टल ‘ऑन लाइन इंटरनेशनल न्यूज नेटवर्क’ कहता है। ओबामा की विश्व शांति के बारे में सोच कितनी पुख्ता और अटल है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने मुखालफत के बाद भी 13 हजार अमेरिकी फौजी अफगानिस्तान भेजने का ऐलान कर दिया। इससे पहले 21  हजार फौजी भेजने का फरमान सुना चुके हैं। ‘मेहर न्यूज. कॉम’ ने इजराइली जेलों में बड़ी तादाद में बेगुनाहों को कैदी बनाकर रखने को आधार बनाकर ओबामा को नोबेल दिए जाने पर सवाल उठाए हैं।

उर्दू अखबार कहते हैं कि बकराक हुसैन ओबामा को भूखमरी, असमानता, नाइंसाफी, विरोध, अत्याचार, नस्ली भेदभाव, मजहबी प्रतिद्वंदता सहित प. एशिया में अमन बहाली, ईरान,  उत्तरी कोरिया से बातचीत, इजराइल-फलस्तीन को करीब लाने, अफगानिस्तान और इराक को जंग से मुक्ति दिलाने, वैश्विक तंगी दूर करने जैसी अहम मसले के प्रति अत्याधिक गंभीरता दिखानी होगी। ‘ऐतमाद’ 1976 की नोबेल पुरस्कार विजेता मेरी ए. मेकाइवर के हवाले से कहता है, मौजूदा अमेरिकी सदर ने अभी ऐसे मसलों पर गैर मामूली संजीदगी नहीं दिखाई है।

एक अखबार की सलाह है, ओबामा को दो-चार साल परखने के बाद नोबेल देना बेहतर होता। इजराइल को नाथना ओबामा के बूते की बात नहीं। हालाकि ओबामा को इनाम दिए जाने के पक्षधर भी कम नहीं। ‘सियासत’ कहता है, कुछ दिनों पहले काहिरा यूनिवर्सिटी में आलमी मुस्लिम बिरादरी के सामने फलस्तीन, इजराइल, इराक, अफगानिस्तान में तनाव कम करने की मंशा जाहिर कर ओबामा ने अच्छी  शुरुआत की है। विश्व को एटमी हथियारों से मुक्त करने की मंशा से ही ईरान पर दबाव बनाया गया। ‘सहाफत’ कहता है, ओबामा को इनाम दिए जाने की आलोचना करने वाली रिपब्लिकन पार्टी के नेता जॉर्ज बुश ने अमेरिकी राष्ट्रपति रहते कभी ऐसी संजीदा पहल नहीं की। इराक और अफगानिस्तान को उन्होंने ही जंग में झोंका है। अमेरिकी की गलत पॉलिसियों से हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के रिश्ते नहीं सुधर पा रहे हैं।
                             
लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं

malik_hashmi64 @yahoo. com

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