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भाग्यशाली भाई

एक बार डाकुओं ने एक गांव पर धावा बोला- लूटपाट के बाद वे जंगल की ओर भागे। तभी वहां से कुछ घुड़सवार सिपाही गुजरे। शोर सुनकर उन्होंने डाकुओं का पीछा किया, लेकिन डकैत हाथ नहीं आए। सिपाही वापस गांव में आए तो भयभीत गांववासी अपने घरों में छिपे हुए थे। लेकिन तीन आदमी एक खेत में काम कर रहे थे।

सिपाही बोले : ‘तुम लोगों ने पहले तो गांव को लूटा और अब किसान होने का नाटक कर रहे हो!’ तीनों ने कहा कि हम इसी गांव में रहते हैं, किसी से भी पूछ लो। सिपाहियों ने उनकी एक नहीं सुनी। वे उन्हें बांध कर महल ले गए। तीनों ग्रामीणों ने राजा को सच्चाई बतानी चाही, लेकिन राजा ने सिपाहियों पर ही विश्वास किया और तीनों को काल कोठरी में रखने का आदेश दे दिया।

दूसरे दिन एक औरत महल के बाहर चीखने-चिल्लाने लगी। अब वह हर रोज आती और काफी देर तक जोर-जोर से रोती रहती। एक दिन राजा ने उसे बुलाया और रोने का कारण पूछा। कहने लगी : ‘महाराज, आपने मेरे पति, बेटे और भाई को कैद कर रखा है। वे तीनों निर्दोष हैं।’

राजा ने तीनों बंदी बुलाए और बोला : ‘इन पर डाका डालने का आरोप है, इन्हें तो फांसी होनी चाहिए।’ वह राजा के कदमों में गिर पड़ी। राजा ने कहा : ‘तुम कहती हो तो एक को छोड़ देता हूं। बताओं, किसे रिहा करूं?’ महिला सोच में पड़ गई। फिर बोली : ‘अच्छा तो मेरा भाई मुङो दे दीजिए।’
राजा बड़ा हैरान हुआ : ‘न पति न बेटा। भाई ही क्यों मांगा तुमने?’

वह बोली : ‘महाराज, इस भरी दुनिया में मैं कहीं भी चली जाऊं, मुङो दूसरा पति मिल जाएगा। पति होगा तो बेटे-बेटियां भी मिल जाएंगे। मेरा एक ही भाई है। मेरे मां-बाप दुनिया में नहीं हैं, इसलिए दूसरा भाई नहीं मिल सकता।’ राजा ने कहा : ‘कितना भाग्यशाली है यह भाई जिसे तुम जैसी बहन मिली!’ राजा ने तीनों को रिहा कर दिया।

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