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चीन को समझना

पिछले कुछ दिनों से अचानक भारत और चीन के रिश्तों में तल्खी आ गई है। दोनों ओर से काफी तीखे बयानों की मुठभेड़ जारी है। भारतीय पक्ष की ओर से शुरू में सीमा पर चीनी गतिविधियों को लेकर आधिकारिक तौर पर नर्म रुख अपनाया गया, लेकिन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अरुणाचल यात्रा पर चीन के तीखे विरोध का उतना ही तीखा प्रतिरोध हुआ। ब्रह्मपुत्र पर बांध बनाने के चीन के तथाकथित प्रयास पर भी विवाद हुआ। मुश्किल यह है कि हमेशा की तरह संबंधों में ऐसी तल्खी की कोई वजह नहीं समझ में आती। जो कारण माकपा बता रही है कि यह भारत पर अमेरिकी दबाव की वजह से है, वह विश्वसनीय नहीं है।

एक ओर चीन से भारत का व्यापार तेजी से बढ़ रहा है, कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन और भारत सहयोगी हैं, लेकिन बीच-बीच में चीन यह बताना नहीं भूलता कि हम प्रतिद्वंद्वी हैं और दोनों के बीच कई मतभेद हैं। इन घटनाओं का तात्कालिक कारण ढूंढना इसलिए कठिन होता है, क्योंकि चीन एक बंद समाज है, उसमें क्या विचार मंथन हो रहा है या क्या घटनाक्रम हो रहा है, यह पता नहीं चलता। 

बाहरी लोगों को सिर्फ आधिकारिक प्रतिक्रिया ही मालूम होती है। लेकिन हमारी समस्या यह है कि चीन हमारा पड़ोसी है और भारतीय उपमहाद्वीप में उसकी उतनी ही सक्रिय उपस्थिति है, जितनी हमारी। यह हम जान गए हैं कि चीन से सीमा पर युद्ध होने की कोई आशंका नहीं है और इस बात की भी कोई संभावना फिलहाल नहीं है कि दोनों देशों की दांत काटी दोस्ती हो जाए। चीन के साथ ‘ब्रिक’ सहयोगी की तरह हमें व्यापार और सहयोग भी करना है और एक चुपे और रहस्यमय पड़ोसी की तरह उससे निभानी भी है।
   
अच्छी बात यह है कि चीन, पाकिस्तान नहीं है, वह एक तेजी से विकास करता हुआ मजबूत अर्थव्यवस्था और एकाधिकारवादी लेकिन सुचिंतित विदेश नीति वाला देश है। संभव है हमें चीन से ऐसे ही निभाते रहना पड़े। एक संभावना यह है कि चीन में अर्थव्यवस्था के साथ राजनीति भी खुलने लगे। चीन जब खुला समाज होगा तो उसको समझना हमारे लिए आसान होगा और हमें भी तब शायद वह बेहतर समझ पाए। कुछ चीन विशेषज्ञों की राय है कि चीन घरेलू समस्याओं से ध्यान हटाने और जनता को एकजुट करने के लिए कभी भारत, कभी रूस, कभी वियतनाम से विवाद चलाता रहता है।  चीन यह समझ लेता है कि घरेलू विवाद लोकतंत्र और खुलेपन से बेहतर ढंग से निपटते हैं तो वह चीन के लिए भी अच्छा होगा और भारत-चीन रिश्तों के लिए भी।

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