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अमेरिका दौरे से पहले

अमेरिका के ओबामा युग में नवंबर के आखिरी हफ्ते में होने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पहले सरकारी दौरे में संबंधों के नए सेतु के निर्माण की तैयारी चल रही है। जाहिर है यह सेतु अतीत में बुश और मनमोहन की तरफ से बनाए गए पुराने सेतु से आगे का होगा और इसकी दिशा भविष्य पर ही केंद्रित होगी। हालांकि भारत चाहता है कि इस दौरान रणनीतिक और सामरिक मामलों से ज्यादा विकास संबंधी मसलों पर बातचीत और समझौते किए जाएं।

फिर भी दोनों देशों के बीच उन मसलों पर भी आपसी समझदारी तैयार करने के लिए कई प्रमुख व्यक्तियों के दौरे चल रहे हैं। हाल में भारत दौरे पर आए अमेरिका के राजनीतिक मामलों के उपमंत्री विलियम जे बर्नस अगर 21 वीं सदी की विश्व व्यवस्था और विश्व समृद्धि के लिए दोनों देशों के संबंधों की  असली कुंजी बता रहे हैं तो जाहिर है कि इससे दोनों के बीच आया बासीपन खत्म होगा और नई तरह की ऊष्मा पैदा हो सकती है।

इसी ऊष्मा को पैदा करने के लिए गृहमंत्री पीसी चिदंबरम अमेरिका हो कर आए हैं और बर्नस के दौरे के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार वहां जाने वाले हैं। इसी क्रम में भारत ने नाभिकीय संयंत्रों के विलगन की योजना भी अधिसूचित कर दी है। उसने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजंसी को बता दिया है कि उसके किन रिएक्टरों में बिजली बनाने के लिए रेडियोधर्मी ईंधन का प्रयोग होगा और कहां रक्षा संबंधी शोध के कार्य होंगे। इसका वायदा भारत अमेरिका के साथ प्रस्तावित नाभिकीय समझौते के तहत मार्च 2006 में किया था जिसे अब लागू कर दिया गया है।

इस अधिसूचना के साथ एक तरफ भारत ने अमेरिका में उन लोगों का मुंह बंद कर दिया है जो एटमी अप्रसार का मुद्दा उठा कर आलोचना करते रहते हैं और दूसरी तरफ प्रयुक्त ईंधन के पुनशरेधन के बारे में होने वाले समझौते के रास्ते को सुगम बनाया है। दूसरा अहम मसला जलवायु परिवर्तन के मसले पर भारत और चीन से कोई समझौता करना उसके लिए आश्वासन लेने का है ताकि कोपेनहेगन में सीमित अर्थो में ही सही पर कुछ हासिल किया जा सके। भारत चाहता है कि उसे पर्यावरण के अनुकूल काम करने वाली ऐसी प्रौद्योगिकी दी जाए जो सौर ऊर्जा वगैरह के उत्पादन में मदद करे। जाहिर है डेमोक्रेट नेता ओबामा के दौर में भारत को संवाद के उन मुहावरों को बदलना होगा जो उसने बुश के समय में गढ़े थे।

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