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राजनीति से दूर रखें गौ-गंगा अभियान को

गो-गंगा रक्षा अभियान का शुभारंभ उत्तराखंड से होना स्वागत योग्य है, मगर इसे राजनीतिक शक्ल नहीं दी जानी चाहिए। यह भारत की धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक व भौगोलिक पहचान से जुड़ा मुद्दा है। यह मुद्दा किसी जाति, संप्रदाय से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह आम जनमानस के हितों से जुड़ा है। गाय जो धार्मिक, आध्यात्मिक तथा वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण है, आज उसकी दुर्दशा हो रही है। गाय के सभी अंग यहां तक कि मल-मूत्र जैसे अवशिष्ट पदार्थ भी पवित्र माने जाते हैं। गाय का दूध वैज्ञानिक परीक्षणों में सर्वाधिक पोषक निकला है, इसलिए तो प्राचीन भारत में गो को माता का दर्जा दिया गया। वैदिक काल में तो गाय व गोशाला के बिना किसी घर की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। मगर आज गाय व गोशाला दोनों तेजी से विलुप्त होते जा रहे हैं, जो थोड़ी बहुत है भी उनको लावारिस छोड़ा जा रहा है। गायों की घटती संख्या से यह अहम प्रश्न उठता है कि क्या गाय का अस्तित्व भी कायम रह पायेगा? इसी तरह पतित पावनी माँ गंगा व उसकी सहायक नदियां जिस तरह से अपने उद्गम स्थलों से ही प्रदूषित हो रही हैं, वह बेहद चिंतनीय है। उत्तराखंड के पवित्र तीर्थो को सिर्फ पैसे कमाने का अड्डा बनाने, सरकारी बेरुखी तथा संतों की चुप्पी से गंगा के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न् लग गया है।
शंकर प्रसाद तिवारी, रुद्रप्रयाग

प्रकृति संरक्षण के प्रयास हों
मानव विकास की ऊंची दौड़ ने पूरी प्रकृति को विकृत करके रखा तो आज हर कोई अपने-अपने ढंग से संरक्षण के लिए भी चिल्ला रहा है। जल, जंगल, जमीन, नदी, हिमालय, पर्यावरण, वन्य जीव-जन्तु, ग्लेशियर और न जाने क्या-क्या जो कि इस सृष्टि के अंग हैं, को बचाने के लिये हर स्तर से होहल्ला हो रहा है। उत्तराखंड में किसी भी विकास योजना के क्रियान्वयन से नहीं लगता कि यहां की संवेदनशीलता को ध्यान में रख कर गहन अध्ययन के पश्चात लागू हो रही हों, जबकि पृथक राज्य की मांग के पीछे अवधारणा यही थी कि पहाड़ की प्राकृतिक संवेदनशील संरचना को ध्यान में रखकर योजनाएं लागू हों।  15-20 वर्ष पूर्व के 50 प्रतिशत से भी अधिक जल स्नोत सूख चुके हैं। वनों की हरियाली खत्म हो रही है तो वन्य प्राणियों की प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। फिर भी जो थोड़ा बहुत शेष बचा है, उसके संरक्षण के तो प्रयास होने ही चाहिए ।
डॉ. गुलाब सिंह राणा, रुद्रप्रयाग

जरूरी हुई लाल बत्ती
राज्य की पूर्व तिवारी सरकार और कांग्रेस पार्टी का पतन इसी लाल बत्ती के चलते हुआ था। तिवारी ने मंत्री बनने से रह गए सभी विधायकों को लाल बत्तियां देकर अनुग्रहीत किया। उसके बाद पिछले चुनाव में तिवारी सरकार का सफाया इसी लाल बत्ती के कारण हो गया। उसके पश्चात राज्य में खंडूड़ी की सरकार बनी तो सरकार बनने के कुछ माह बाद फिर लाल बत्तियां बांटी गईं। उसके पश्चात मुख्यमंत्री निशंक ने पुराने कार्यकर्ताओं और विधायकों को लाल बत्ती का तोहफा देकर अनुग्रहीत किया है। लगता है कि कांग्रेस हो या भाजपा सभी राजनीतिक दलों के विधायकगण इसके बिना रह नहीं सकेंगे। ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय स्तर पर हर पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को लाल बत्ती दिया जाना आवश्यक-सा हो गया है।
सरफराज अहमद, हरिद्वार

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