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जीन्स: जीवन का ब्लूप्रिंट

एक जमाना था जब हम जीवन को ही एक अजूबा मानते थे। फिल्म के दर्शक की तरह ही हम पर्दे के पीछे की पूरी कहानी से अंजान थे। समय ने करवट बदली। विज्ञान की तरक्की ने कई नई पर्ते खोली। मौजूदा दौर में न केवल हम ये जान चुके हैं कि जानवरों की उत्पत्ति कैसे हुई, उनमें बदलाव कैसे आया, बल्कि हम ये भी पता लगाने में सफल हो चुके हैं कि इन परिवर्तनों के लिए कौन सा जेनेटिक परिवर्तन (म्यूटेशन) प्रमुख कारक है। इनमें से सबसे रहस्यपूर्ण बात यह थी कि हम देख सकते थे कि जीन (गुणसूत्र) कैसा दिखता है। गौरतलब है कि जीन द्वारा ही प्रोटीन का निर्माण होता है जो जीवन का प्रमुख आधार है।

नए जीन की उत्पत्ति का सबसे स्पष्ट तरीका है कि लगातार छोटे और फायदेमंद परिवर्तन के द्वारा उसका निर्माण हो। अस्पष्ट तरीका ये है कि कैसे एक मौजूद जीन जो कि पहले ही कुछ महत्वपूर्ण कर चुका है, उसकी उत्पत्ति किसी अलग जीन से हो। ऐसे जीन का बिना ऑर्गेनिज्म को बदले, मार्ग बदलना काफी मुश्किल है। हालांकि शताब्दियों पहले जीवविज्ञानियों का मानना था कि बिना किसी अवरोध के भी जीन की एक अतिरिक्त कॉपी बन सकती है। कई मामलों में ये देखने में आता है कि जीन की कॉपी से हानिकारक परिवर्तन होने लगते हैं और वह खत्म हो जाता है। कभी-कभार ही ऐसा होता है कि म्यूटेशन के परिणामस्वरूप बना डुप्लीकेट जीन कुछ बेहतर कर पाता है।

आश्चर्य की बात ये है कि जीन डुप्लीकेशन उतना ही आम है जितना म्यूटेशन (परिवर्तन)। प्रजनन क्रिया के दौरान क्रोमोसोम्स के बीच में पदार्थ के आदान-प्रदान में हुई गलती से डीएनए सिक्वेंस की अतिरिक्त कॉपी बन जाती है जिसमें जीन की संख्या एक से लेकर सौ तक हो सकती है। डाउन सिंड्रोम की स्थिति में पूरे क्रोमोसोम्स की डुप्लीकेट कॉपी बन जाती है और कभी-कभी तो पूरे जीनोम की।

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि लाखों वर्ष पहले एक वास्तविक जीन से कई हजार नए जीन बने होंगे। मानवों में छोटे रिसेप्टर में अकेले तकरीबन 400 जीन है जो कि लगभग 450 मिलियन वर्ष पहले मछली से मिले दो जीन्स से बने थे। हालांकि जीन की उत्पत्ति कापरंपरागत दृष्टिकोण इस पूरी कहानी से अलग है। ब्लूमिंगटन के इंडियाना विश्वविद्यालय के माइकल लिंच और उनके सहयोगियों ने वैकल्पिक पक्ष प्रस्तुत किया है। अकसर जीन के एक से ज्यादा फंक्शन होते हैं। लिंच ने ये समझने की कोशिश की कि आखिर जीन का डुप्लीकेशन कैसे होता है और डुप्लीकेशन के बाद होता क्या है ? लिंच का कहना था कि अगर जीन की एक कॉपी के दो फंक्शनों में से एक में परिवर्तन हो तो यह परिवर्तन सामान्य होता है।

कई थियोरेटिकल बायोलॉजिस्ट मानते हैं कि जीन की कॉपी का संरक्षण किया जा सकता है। लेकिन कई अध्ययनों से पता चला है कि जीन का परंपरागत मॉडल एक बड़ी चुनौती है। उसके लिए नए जीन का विस्तृत अध्ययन किया गया है। तकरीबन एक वर्ष पूर्व चीन के इंस्टीटय़ूट ऑफ जोलॉजी की टीम ने वेन वांग के नेतृत्व में जीन पर एक काबिले गौर अध्ययन किया। यह अध्ययन फ्रूट फ्लाई प्रजाति पर किया गया था। उनके जीनोम का अध्ययन करने के बाद उनकी तुलना की गई। वांग ने उन जीन्स की खोज की जिनकी उत्पत्ति 13 मिलियन वर्ष पहले हुई थी।

वांग की एक खोज जिसने लोगों को हैरत में डाल दिया, में उनका का कहना था कि करीब दस प्रतिशत जीन की उत्पत्ति रेट्रोपॉजिशन प्रक्रिया द्वारा हुई है। यह तब होता है जब मैसेंजर आरएनए जीन की कापी करता है। इसके ब्लूप्रिंट को प्रोटीन का निर्माण करने वाली फैक्ट्री को भेजा जाता है। जो कि बाद में डीएनए में बदल जाता है। उसके बाद इसे किसी तरह जीनोम में डाल दिया जाता है। कई वायरस और जेनेटिक पैरासाइट रैट्रोपोजीशन प्रक्रिया के द्वारा खुद को कापी करते हैं। किसी घटना के दौरान वह कभी-कभार एंजाइम का उत्पादन करते हैं।

रेट्रोपोजीशन प्रक्रिया द्वारा बनने वाली जीन की कापी वास्तविक जीन की तरह नहीं होती। इस जीन में प्रोटीन की सिक्वेंस कोडिंग से कुछ ज्यादा होता है। कोडिंग पार्ट के सामने ‘प्रमोटर’ रीजन होते हैं जहां दूसरे जीन बंधते हैं। रेट्रोपोज्ड जीन की कापी अपने प्रमोटर को खोती जाती है जो आरएनए के रूप में ट्रांसक्राइब नहीं होते। फिर ये लुप्त होती जाती है।

स्पेशल प्रमोशन
हालांकि यह पूरी तरह स्पष्ट है कि रेट्रोपोज्ड कापी कभी-कभी जीनोम में पड़ी हुई होती है और उसे सक्रिय बनाने का काम करती है। एक अलग प्रमोटर की मदद से अलग समय या अलग ऊतकों के साथ या दोनों से क्रिया करेगा। इस तरीके से एक रेट्रोपोज्ड जीन जल्द ही नया फंक्शन प्राप्त करता है। इस प्रक्रिया के द्वारा ही हालिया कई नए जीन की उत्पत्ति हुई है जो कि वनमानुषों से मिले हैं। अकसर नए जीन की उत्पत्ति से बड़े परिवर्तन होते हैं। अपने फ्रूट फ्लाई सर्वे में वांग ने देखा कि तकरीबन एक तिहाई जीन अपने पैरेंट जीन से अलग है। वे अपना सिक्वेंस खो चुके हैं।

आखिर अतिरिक्त सिक्वेंस कहां से आएंगे? जटिल कोशिकाओं में प्रोटीन की डीएनए कोडिंग कई भागों में टूट जाती है, जो नॉन कोडिंग सिक्वेंस द्वारा अलग की जाती है। एक बार पूरे जीन की आरएनए कापी बन गई तब नॉन कोडिंग बिट ‘इंट्रान’ खत्म हो जाती है और कोडिंग पार्ट ‘एक्सॉन’ जुड़ जाती है। इसके बाद ये एडिटिंग आरएनए कॉपी कोशिका के प्रोटीन बनाने वाले भंडार को भेजी जाती है। जीन में मॉडयूलर फॉर्म की वजह से परिवर्तन की संभावना काफी बढ़ जाती है। ज्यादातर बंदर एक प्रोटीन जिसे टीआरआई5 कहते हैं, का उत्पादन करते हैं।

यह रेट्रोवायरस द्वारा होने वाले इंफेक्शन से बचाते हैं। दस वर्ष पहले एशिया में रेट्रोपोजीशन द्वारा सीवाईपीए जीन की अक्रिय कापी बना ली गई थी। जिसे बाद में टीआरआई5 जीन में डाल दिया गया। परिवर्तन के बाद कोशिका ने शिमेरिक प्रोटीन का उत्पादन कर दिया जिसमें कुछ टीआरआई 5 और कुछ सीवाईपीए था। यह प्रोटीन कुछ वायरसों के खिलाफ बेहतर सुरक्षा प्रदान करता है। करीब ऐसा ही दक्षिणी अमेरिका के आउल मंकी के साथ हुआ था।  कई दशकों पहले कहा गया था कि यूनिक जीन फ्रेमशिफ्ट म्यूटेशन द्वारा बनते हैं। प्रत्येक अमीनो एसिड में मौजूद प्रोटीन को तीन डीएनए अक्षरों या क्षारों द्वारा इंगित किया जाता है। इसे ‘ट्रिपलेट कोडोन’ कहते हैं। अगर म्यूटेशन कोडोन को पढ़े जाने वाले शुरुआती बिंदु को शिफ्ट कर देता है तो सिक्वेंस पूरी तरह से अलग हो जाता है। 

कई जेनेटिक बीमारियां फ्रेमशिफ्ट म्यूटेशन की वजह से होती हैं जो प्रोटीन को तोड़ देती हैं। ज्यादातर म्यूटेशन उत्पादित जीन के रीडिंग फ्रेम को बदल देती हैं। 2006 में टोरंटो विश्वविद्यालय के स्टीफन शेरर और उनके सहयोगियों ने नए जीन के ह्यूमन जीनोम की खोज की जिसकी उत्पत्ति फ्रेमशिफ्ट म्यूटेशन द्वारा प्रभावित जीन के एक भाग से होती है।

किसे जरूरत है नए जीन की
शरीर के नए अंग बनाने के लिए ऑर्गेनिज्म को हमेशा नए जीन (गुणसूत्र) की जरूरत नहीं होती। एक जीन से कई प्रोटीनों का निर्माण किया जा सकता है, जबकि एक प्रोटीन अकसर शरीर के अलग-अलग अंगों में अलग काम करता है। वैकल्पिक आरएनए को जोड़ने से प्रोटीन की बड़ी वैरायटी बनाई जा सकती है। एक अध्ययन में पता लगा कि जितना लोग सोचते हैं अल्टरनेटिव स्पाइलिसिंग उससे कहीं आम है। ज्यादातर जीन दो वैरिएंट उत्पादित करते हैं। एक मानव जीन बीएन2 दो हजार से अधिक जीन उत्पादित करता है जिनमें कुछ में बिल्कुल समानता नहीं होती। येल यूनिवर्सटी ऑफ मेडिसन के एक दल ने देखा कि दो अलग मानव जीन को एक साथ एडिट करके नया प्रोटीन बनाया जा सकता है।

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