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राइबोसोम : जीवन का आधार

राइबोसोम आरएनए और प्रोटीन में पाए जाने वाले कण होते हैं, जो रक्त की हरेक कोशिका में मिलते हैं। बैक्टीरिया आदि जीवों के राइबोसोम का ढांचा कुछ फर्क होता है। राइबोसोम उस प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं जो न्यूक्लिक एसिड के जेनेटिक को प्रोटीन चेन में बदलते हैं। राइबोसोम एक संदेशवाहक आरएनए के साथ नत्थी रहते हैं जिसे वह अमीनो एसिड को सही सूची में लगाते हैं। अमीनो एसिड संदेशवाहक आरएनए मॉलीक्यूल्स के साथ स्थापित रहते हैं।

हरेक प्राणी के सेल (कोशिका) में डीएनए मॉलीक्यूल्स होते हैं। इनसे मानव, पौधे या बैक्टीरिया का व्यवहार पता चलता है यानी यह इन प्राणियों का ब्लूप्रिंट होता है, लेकिन डीएनए मॉलीक्यूल अपने आप में निष्क्रिय होता है। राइबोसोम के कारण यह ब्लूप्रिंट सक्रिय होते हैं। डीएनए पर आधारित राइबोसोम प्रोटीन निर्माण करते हैं जो ऑक्सीजन ले जाने वाली हीमोग्लोबिन, इम्यून सिस्टम की एंटीबॉडीज, इंसुलिन जैसे हार्मोन, त्वचा की प्रोटीन कोलेगन या शुगर कम करने वाले एंजाइम्स होते हैं। शरीर में हजारों प्रोटीन होते हैं जिनके अलग-अलग कार्य होते हैं। वह रासायनिक स्तर पर जीवन निर्माण और उसका रख-रखाव करते हैं।

दवा के रूप में दी जाने वाली एंटीबायटिक्स बैक्टीरियाई राइबोसोम को रोककर बीमारियों का इलाज करते हैं। सक्रिय राइबोसोम के बिना बैक्टीरिया का अस्तित्व नहीं बना रह सकता। इसीलिए राइबोसोम नई एंटीबायटिक्स के लिए जरूरी लक्ष्य है। हाल में भारतीय मूल के वैज्ञानिक वेंकटरमन रामकृष्णन को रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें रक्त में प्रोटीन का निर्माण करने राइबोसोम्स की संरचना और कार्यप्रणाली के लिए यह पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया।

राइबोसोम की दो उप-इकाइयां होती हैं जो एकसाथ मिलकर प्रोटीन इकाई निर्माण की दिशा में काम करती हैं। प्रत्येक बड़े आरएनए मॉलीक्यूल में एक से दो बैक्टीरियल उपइकाई और एक से तीन यूकर्योटिक इकाइयां होती हैं। साथ ही कई छोटे प्रोटीन मॉलीक्यूल्स भी होते हैं।

राइबोसोम की खोज 1950 के दशक में रूमानियाई जीव वैज्ञानिक जॉर्ज पेलेड ने की थी। उन्होंने इस खोज के लिए इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल किया था, जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ‘राइबोसोम’ नाम 1958 में वैज्ञानिक रिचर्ड बी. रॉबर्ट्स ने प्रस्तावित किया था। इस लिहाज से राइबोसोम्स और उसके सहयोगी मॉलीक्यूल्स गत सदी के मध्य ये विज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए हुए हैं और आज उन पर काम काफी तेज गति से हो रहा है।

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