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तीसरा मोर्चा: सपना, संभावना या झांसा

तीसरे मोर्चे का निर्माण अभियान गति पकड़ रहा है। एक और वामपंथी खासकर माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी इस बारे में सक्रिय नजर आती है। दूसरी ओर तीसरे मोर्चे के ऐलान के लिए बहुत सारे ऐसे लोग उतावले नज़र आ रहे हैं, जिन्हें भानुमति के बेमेल कुनबे का ही सदस्य कहा जा सकता है। इस लम्बी सूची में उन सभी नामों को शुमार किया जा सकता है जो किसी न किसी कारण कांग्रेस या भाजपा से खिन्न और अप्रसन्न हैं तथा व्यक्ितगत बकाया हिसाब-किताब चुकता करना चाहते हैं। दुर्भाग्य यह है कि पिछले दिनों तीसरे मोर्चे की जन्म की प्रसव वेदना सुर्खियों में छाई रही है और मतदाता को असमंजस में ही डालने वाली सिद्ध हुई है। आगे बढ़ने से पहले वामपंथी खेम की कथनी और करनी पर नार डालने की जरूरत है। प्रकाश करात जैसे नेता की ईमानदारी और विचारधारा के प्रति निष्ठामेय संदेह की रत्तीभर गुंजाइश नहीं पर यह सवाल उठाया जाना जरूरी है कि क्या भारतीय माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में प्रकाश करात के विचारों और कार्यक्रम से सबकी सहमति है? इससे भी बड़ा बुनियादी सवाल यह है कि आज के हिन्दुस्तान और भूमंडलीकरण वाली दुनिया कट्टरपंथी माक्र्सवादी विचारधारा के लिए कितनी जगह बची रही है। खासकर उसके स्तालिनवादी संस्करण के लिए। जब चीन और रूस का कायाकल्प हो चुका है, तब भारतीय साम्यवादियों का वैचारिक शुद्धि का हठ पाले रहना समझ में नहीं आता। इस बात को अनदेखा करना कठिन है कि आयात की हुई पार्टी लाईन के प्रति मोह के कारण और लकीर का फकीर बने रहन का आग्रह ही इस बात के लिए जिम्मेदार है कि भारतीय कम्युानिस्ट पार्टी कभी भी बंगाल, केरल तथा त्रिपुरा के अलावा कहीं भी व्यापाक जनाधार प्राप्त करने में असमर्थ रही है। यहां विस्तार से उस प्रसंग का विश्लेषण करन की गुंजाइश नहीं कि कैसे रणदिवे और पी. सी. जोशी के टकराव के वक्त यह अन्तरविरोध आत्मघातक सिद्ध हुआ था पर इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि भारतीय समाज की असलियत को नकारने वाली ‘निरन्तर’ कोई भी राजनैतिक दल मतदाता के सामने सार्थक विकल्प प्रस्तुत नहीं कर सकता। रही बात धर्मनिरपेक्षता की तो इसकी कलई कब की खुल चुकी है। बांग्लादेश से आने वाले नाजायज घुसपैठियों के प्रति माक्र्सवादी अंधे बने रहते हैं और इन्हीं के दबाव में (जब यह यूपीए के समर्थक थे) असम तक में जानलेवा संकट पैदा हो गया। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पक्षधरता अल्पसंख्यक मुसलमानों के प्रति सैद्धांतिक कारणों से नहीं, बल्कि अपना वोट बैंक बढ़ान के ही कारण है। केरल में भी यही प्रवृति साफ देखी जा सकती है। लम्बे समय तक लोग यह भ्रम पाले रहे थे कि माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य अनुशासित काडर के होते हैं, हाल के दिनों में केरल में इस पार्टी के सम्मेलनों में पीये-खाय कार्यकर्ताओं ने ऐसा उत्पात मचाया है, जिसके बाद यह सुझाना एक क्रूर मज़ाक ही लगता है। चाहे आगामी चुनाव में कुल मिलाकर वामपंथी गुट की कुल सांसद संख्या में ज्यादा इजाफा या घाटा न हो, इस बात की संभावना बहुत कम है कि वह किसी भी उदीयमान तीसरे मोर्चे या विकल्प की नींव का पत्थर बन सकते है। यह सच है कि भाजपा के साथ निकट भविष्य में वह हाथ नहीं मिला सकते, पर इस बात की पूरी संभावना है कि जरूरत पड़ने पर वह थूका हुआ चाटने वाली मुद्रा में फिर स कांग्रेसी खेमे में घुस जाये। तीसरे मोर्च को लेकर सबसे ज्यादा अटकलबाजी मायावती को लेकर गरम है। बहन जी स्वयं और उनके समर्थक उन्हें अगले प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने लगे हैं। जाहिर है कि मायावती और बसपा के लिए तीसरे मोर्च की उपयोगिता सिर्फ इतनी भर है कि वह उनकी महत्वकांक्षा पूरी करन का उपयोगी साधन हो सकता है। यह बात भुलाई नहीं जा सकती कि भले ही मायावती का प्रभाव क्षेत्र उत्तर प्रदेश तक ही सिमटा है। इस बात की जबर्दस्त संभावना है कि उत्तर प्रदेश की अस्सी सीटों में सबसे अधिक सांसद उन्हीं की झोली में होंगे और केन्द्र में साझा सरकार के निर्माण के लिए किसी भी गठबंधन की ताजपोशी उनके तथा वामपंथियों के समर्थन के बिना नहीं हो सकती। मायावती की कोई विवशता भाजपा को या कांग्रेस को अछूत समझने की नहीं है। उनका बुनियादी बैर या विरोध किसी से है तो मुलायम सिंह-अमर सिंह की सपा से। इस जानलेवा दुश्मनी की जड़ है उत्तर प्रदेश में एकक्षत्र राज करन की दोनों की ही अदम्य महत्वकांक्षा। मुलायम आज भले ही यह कह रहे हों कि वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं पर यह बयान विनम्रता वश नहीं मजबूरी में ही दिया गया है। आज हालत यह है कि मायावती को अपदस्थ करन के लिए रणनीति बनाते वक्त उन्हें बड़बोली धर्मनिरपेक्षता को ताक में रखते हुए कल्याण सिंह को गले लगाना पड़ा है और इसके अलावा मायावती सरकार के उत्पीड़न से बचने के लिए निरंतर यूपीए सरकार का मुंह ताकना पड़ा है। इसी का नतीजा है कि सीटों के बंटवारे को लेकर भयंकर सरफुटौवल के बाद भी सपा यह घोषणा कर रही है कि उत्तर प्रदेश में कई सीटों पर वह कांग्रेस के साथ दोस्ताना चुनावी लड़ाई लड़ेगी। मतदाता के लिए यह नूरा-कुश्ती बेहद उबाऊ हो चुकी है। बचे रहते हैं, चन्द्रबाबू नायडू, जयललिता और देवेगौड़ा। सभी प्रधानमंत्री बनने लायक दिग्गज हैं और देवेगौड़ा तो यह सुख संयोगवश भोग भी चुके हैं। ऐसा नहीं जान पड़ता कि छीका दुबारा उनके भाग्य से नहीं टूटने वाला। वैसे भी मुलायम सिंह की ही तरह उनको भी ब्रह्मानंद सहोदर जैसा सुख अपने सूब के राजपाट में ही नार आता है। जब तक कर्नाटक में उनकी तूती बोलती है, तब तक वह केन्द्र में किसी का भी समर्थन कर सकते है। इस घड़ी भले ही वह धर्मनिरपेक्ष चोला ओढ़े हों, भाजपा से उन्हें कोई परहेज नहीं। कुछ ऐसा ही हाल नवीन पटनायक का भी है, जा कालिंगाधिपति बने रहन के लिए ही भाजपा से अलग हुए हैं और तमाम प्रगतिशील कांग्रेसी और वामपंथी जो उन्हें गले लगान को आतुर हैं, वह यह बात आसानी से भुला रहे हैं कि पिछले सात-आठ साल वह बेहिचक भाजपा के हमबिस्तर रहें है। जयललिता और चन्द्रबाबू नायडू की प्राथमिकता अपनी गवांई जागीर को फिर से हासिल करन की है। तेलंगाना राज्य की लड़ाई लड़ रहे चन्दशेखर राव की हालत तो और भी खस्ता है। तीसरे मोर्चे का हाल उस गुन्चे जैसी है जिसकी हसरत तो सबकों थी, पर जो बिन खिले ही मुर्झा गया। श्चह्वह्यद्धश्चद्गह्यद्धश्चड्डठ्ठह्ल ञ्चद्दद्वड्डन्द्य.ष्oद्व लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं।

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