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आंध्र प्रदेश : भद्दी जुबान की राजनीति

अपने सारे तामझाम के साथ यह चुनाव का वक्त है। राजनैतिक उठापटक, जोड़-तोड़, उम्मीदवारों के चयन और प्रचार की रणनीति के लिए सलाह मशवर के साथ-साथ रायशुमारी, सव्रेक्षण और चुनाव विशेषज्ञों के विश्लेषण और ज्योतिषियों की भविष्यवाणी भी इसी तामझाम का हिस्सा है। आंध्र प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ हो रहे हैं। यहां कुछ बातें हैं, जो परिदृश्य को जटिल बना रही हैं और भविष्यवाणी करना ज्यादा मुश्किल कर रही है। सारे देश में ही परिसीमन के बाद यह पहला चुनाव है, यहां भी इसी वजह से नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं। दूसरी बात जो आंध्र के संदर्भ में विशेष है कि यहां वोटों के तीन हिस्सों में बंटने की संभावना है। पिछले तीस साल में यह पहली बार होगा कि यहां कांग्रेस और तेलुगु देशम पार्टी में सीधा मुकाबला नहीं है। अभिनेता-नेता चिरांीवी की नई प्रजा राज्यम पार्टी (पीआरपी) अपने पहले ही चुनाव में सत्ता की मजबूत दावेदार है। इसके अलावा भाजपा, एमआईएम और लोकसत्ता पार्टी जसी छोटी-मोटी ताकतें हैं, जिनका कुछ-कुछ क्षेत्रों में असर है। आम मतदाता ने इस परिदृश्य को धुंधला बनाने में अपना योगदान दिया है, क्योंकि वह अपना रुझान कतई नहीं बता रहा है। भीड़ सबकी सभाओं में उमड़ रही है। ऐसे में तीनों ही पार्टियां मजबूत लग रही हैं। कांग्रेस ने ऐसे में यह घोषणा की है कि वह अपने पिछले पांच साल के काम-काज के बूते अकेले चुनाव लड़ रही है। राष्ट्रीय स्तर पर तीसर मोर्चे के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली तेलुगु देशम पार्टी ने वाम पार्टियों और तेलंगाना राज्य समिति से तालमेल किया है। यहां यह याद किया जा सकता है कि टीडीपी 2004 में कांग्रेस और टीआरएस के साथ आने से हारी थी। पीआरपी ने भी दो-एक तेलंगाना पार्टियों से तालमेल किया है जसे पूर्व टीडीपी नेता देवेंद्र गौड़ की नव तेलंगाना पार्टी (एनटीपी) और फिल्म अभिनेत्री विजयाशांति की तल्ली तेलंगाना पार्टी (टीटीपी)। इन तीनों राजनैतिक शक्ितयों के रोड शोज में भीड़ उमड़ी थीं, जिससे सारी पार्टियां बहुत खुश हैं। इन रोड शोज का एक परिणाम यह था कि सड़क यातायात ठप हो गया और मामला अदालत में पहुंच गया। हाईकोर्ट ने ऐसे प्रदर्शनों पर अस्थायी रोक लगा दी। ये रोड शोज बाद में भी दूसर नामों से जारी रहे और जनता पर राजनैतिक भाषणों की बौछार चलती रही। यह सब हमार किस्म के लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन राजनैतिक संवाद का स्तर बेहतर होना चाहिए। सभ्य भाषा की सीमाएं तोड़ कर नेता बहुत निचले स्तर पर उतर आए। टीडीपी और पीआरपी की महिला शाखाओं के प्रमुखों का विवाद सभ्यता की हर मर्यादा को तोड़ गया। शोभा रानी को पीआरपी की महिला शाखा ‘महिला राज्यम’ का अध्यक्ष एक महीने पहले ही बनाया गया था। शोभा रानी वकील हैं और काफी वक्त तक वकालत कर चुकी हैं। वे फिल्म सेंसर बोर्ड की सदस्य भी रह चुकी हैं। उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि वे राज्य महिला कांग्रेस प्रमुख गंगा भवानी और टीडीपी महिला शाखा प्रमुख पूर्व फिल्म अभिनेता रोा के पीआरपी अध्यक्ष पर किए गए आक्रमणों का जवाब दें, और उन्होंने उसे अपने तरीके से किया। शोभा रानी ने कहा कि नायडू ने अपने विरोधियों पर रोा को ‘आवारा कुत्ते’ की तरह छोड़ दिया है, रोा ने ब्लू फिल्मों में काम किया है, उन्होंने निर्माताओं के बेटों को लुभाकर फिल्मों में काम पाया और फिर उन सबको बेवकूफ बनाया। इस ‘आइटम गर्ल’ को दूसर नेताओं के बार में सस्ती बातें करने की बजाए, वापस फिल्मों में लौट जाना चाहिए। हालांकि यह सब रोा के भड़काऊ बयानों के जवाब में था, लेकिन जनता विवाद के इस स्तर से परशान जरूर हुई। दोनों कट्टर राजनैतिक विरोधी विधानसभा की हर बहस में एक दूसर पर वार करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। मुद्दा कोई भी हो- चाहे आतंकवाद या भ्रष्टाचार या आम आदमी की समस्याएं, वह इन दोनों नेताओं के कीचड़ उछालने में गुम हो जाता। यहां ऐसी बहसों के कुछ उदाहरण पेश हैं। टीडीपी अध्यक्ष और विधानसभा में विरोधी दल के नेता को वाईएमआर ने कहा- मैं आपका ऐसा पर्दाफाश करूंगा कि आप अपनी मां की कोख से अपने पैदा होने पर पछताएंगे। उस दिन टीडीपी के सभी विधायकों को इसका विरोध करने पर विधानसभा से एक दिन के लिए निलंबित कर दिया गया। एक बार नायडू ने रड्डी को धमकी दी कि ‘मैं देखूंगा कि तुम्हारा खात्मा हो जाए।’ इस पर रड्डी ने कहा- ‘शट अप!’ जब रासा राज्य इस बात का इंतजार कर रहा था कि विधानसभा कैसे सत्यम मामले से निपटती है, तब भी ये दोनों नेता व्यक्ितगत आक्रमणों से ऊपर नहीं उठे। rड्डस्र्द्धड्ड1न्ह्य2ड्डठ्ठड्डह्लद्ध७३ ञ्च4ड्डद्धoo.ष्oद्व लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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