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कला हिन्दी सिनेमा के सशक्त अभिनेता ओमपुरी

कला हिन्दी सिनेमा के सशक्त अभिनेता ओमपुरी

कला फिल्मों के जरिए अपने फन का लोहा मनवाने के बाद तमाम तरह की भूमिकाओं में अपने दमदार अभिनय से रंग भरने वाले ओमपुरी व्यवसायिक सिनेमा के मौजूदा दौर में भी कला फिल्मों को प्रासंगिक मानते हैं और मनमाफिक भूमिका मिलने पर एक बार फिर कला फिल्मों की ओर लौटना चाहते हैं ।

आक्रोश, अर्धसत्य, आघात और द्रोहकाल जैसी फिल्मों में यादगार किरदार निभाने वाले ओमपुरी फिर से इसी तरह की भूमिका निभाना चाहते हैं, लेकिन इस तरह की फिल्मों के घटते प्रचलन से वह मायूस हैं। हालांकि, उन्हें इस तरह की फिल्में बनने और उसमें काम करने की उम्मीद है । 70 वर्षीय ओमपुरी का कला फिल्मों के बारे में कहना है ,इस तरह की फिल्में अखबार के संपादकीय की तरह होती हैं, जिसे अखबार के सभी पाठक तो नहीं पढ़ते हैं लेकिन इसका अपना महत्व होता है और इसे पढ़ने वाला एक निश्चित पाठक वर्ग होता है । पढ़ने वालों के संख्या के आधार पर संपादकीय का होना या न होना तय नहीं होता।

दिल्ली स्थित नेशनल स्कूल आफ ड्रामा :एनएसडी: से अभिनय का कोर्स करने के बाद ओमपुरी 1976 में मुंबई पहुंचे और 1981 में उन्हें फिल्म आक्रोश मिली ।

आक्रोश में ओमपुरी के अभिनय की जमकर तारीफ हुई और इसके बाद फिल्मी दुनिया में उनकी गाड़ी चल निकली । इन्होंने अपने सशक्त अभिनय से कई फिल्मों को बाक्स आफिस पर सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया । गंभीर सिनेमा के एंग्री मैन माने जाने वाले ओमपुरी ने कई फिल्मों में हास्य कलाकार की भूमिका भी निभाई है। इस साल नौ फिल्में उनके खाते में है, जिनमें से कुछ रिलीज हो चुकी है जबकि कुछ का रिलीज होना बाकी है ।

सैम एंड मी,  सिटी आफ जॉय  और चार्ली विल्सन वार जैसी अंग्रेजी फिल्मों समेत उन्होंने लगभग 200 फिल्मों में काम किया। चार्ली विल्सन में उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिला उल हक की भूमिका निभाई । हाल के वर्षो में मकबूल और देव जैसी गंभीर फिल्मों में अभिनय करने वाले ओमपुरी अपने सशक्त अभिनय के साथ ही अपनी सशक्त आवाज के लिए भी जाने जाते हैं ।

कला और समानांतर फिल्मों के घटते प्रचलन के बारे में ओमपुरी का मानना है कि 1950 और 60 के दशकों में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में अधिकतर लोग थियेटर से आए थे लेकिन जसे जसे वक्त गुजरता गया कला के प्रशंसक घटते गए और व्यवसायिक हित महत्वपूर्ण होते चले गए । यही कारण है कि समाज की स्याह सचाइयों को सामने लाने वाली फिल्में बनाने का जोखिम अब लोग उठाना नहीं चाहते ।

 

 

 

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